कहीं जिद में अकेले न पड़ जाए आडवाणी
लखनऊ। आप पानी की धारा को उल्टा नहीं मोड़ सकते है और ऐसा करने वाले को पानी खुद बहा ले जाता है, लेकिन आडवाणी आज इसी जिद को लेकर बैठ गए है, उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि वह क्या करें। समय जैसे-जैसे बीतेगा वह अकेले पड़ते जाएंगे। क्योंकि सूत्र बता रहे है कि इस समय आडवाणी के साथ जो लोग है उनमें से केवल जसवंत सिंह को छोड़ दे तो बाकी सब कुछ ले देकर मोदी के साथ हो लेंगे।
संघ ने अब लगभग साफ कर दिया है कि भाजपा की अटल (उप्र)-आडवाणी (गुजरात) की जोड़ी की जगह अब नई जोड़ी होगी मोदी (गुजरात)-राजनाथ (उप्र)। चुनाव तक यही जोड़ी भाजपा के सारे बड़े निर्णय लेंगी। आडवाणी के साथ जो लोग खड़े है उनमें सुषमा स्वराज का नाम प्रमुख है। लेकिन सुषमा स्वराज आडवाणी से ज्यादा चतुर है और उनका मोदी के साथ सीधा झगड़ा भी नहीं है यहां तक की दिल्ली में जब नरेंद्र मोदी प्रवक्ता थे तो उनकी राजनीतिक सोच की सबसे बड़ी प्रशंसक सुषमा स्वराज ही थी।
तब मोदी आडवाणी खेमे के माने जाते थे और सुषमा स्वराज भी। पिछले कुछ सालों में जब से सुषमा स्वराज लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनी तो उन्होंने नेता प्रतिपक्ष होने के नाते अपने को एनडीए में पीएम पद का उम्मीदवार मान लिया, लेकिन दिल्ली की राजनीति में सीमित रहने वाली सुषमा को यह नहीं पता था कि सेनापति वही बनता है जिसे लड़ाई का अनुभव होता है और सैनिक उसी सेनापति को पसंद करते है जो विरोधी को कई बार पराजित कर चुका हो। मोदी को भाजपा के शीर्ष नेतृत्व या संघ ने नहीं चुना है उनका चुनाव भाजपा के आम कार्यकर्ता में जोश भरने की उनकी ताकत ने चुना है।
आइये एक नजर डाले भाजपा के उन शीर्ष नेताओं पर जो अभी आडवाणी के साथ नजर आ रहे है।

सुषमा स्वराज
खुद प्रधानमंत्री बनने की इच्छुक हैं लेकिन मोदी के अचानक उभर आने से मजबूरी में आडवाणी के साथ। नहीं तो नेता प्रतिपक्ष बनने के लिए आडवाणी के खिलाफ चली गई थी। मोदी की तरफ यह सोचकर जा सकती है कि यदि मोदी गठबंधन की राजनीति के चलते पीएम पद से रह गए तो उनका नम्बर लग सकता है। फिलहाल उहापोह की स्थिति में। दोनों ही तरफ बने रहना चाहती हैं।

जसवंत सिंह
आडवाणी के न चाहते हुए अटल सरकार में विदेश मंत्री रहे, अटल के बाद अपनी किताब से भाजपा में किनारे किए गए, भाजपा में अब उनकी कोई नहीं सुनता इसीलिए आडवाणी के साथ, कुछ ले देकर वापस आ जाएंगे। राजनाथ और मोदी को उनकी कोई परवाह नहीं।

शत्रुध्न सिन्हा
भाजपा में आडवाणी ही लेकर आए, जदयू से संबंध विच्छेद होने की दशा में बिहार में बड़ी भूमिका की तलाश में, राजनीति से लगभग बाहर होने की वजह से बिहार पर पकड़, मनाने पर मान जाएंगे, लेकिन आडवाणी का साथ नहीं छोड़ेगे।

उमा भारती
मोदी और राजनाथ को सबसे ज्यादा चिंता इसी नाम को लेकर हैं। उमा राजनाथ और आडवाणी दोनों के करीब मानी जाती है। मोदी की उग्र हिंदू नेता की छवि से परेशान, लेकिन अभी खुलकर आडवाणी के साथ नहीं इसीलिए भोपाल में रुक गई और आगे की राह खोले रखने के लिए राजनाथ को पत्र भी लिख दिया। मप्र और उप्र में राजनीति करने वाली उमा के पास इस समय कोई राज्य नहीं है और वह दिग्विजय सिंह की तरह इधर-उधर भटक रही है। शिवराज
यदि मोदी के खिलाफ जाते तो वह मोदी की तरफ चली जाती। उमा भारती अभी वेट एंड वॉच की भूमिका में। राजनाथ के आग्रह को ठुकरा नहीं पाएंगी।

आदित्यनाथ
राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा नाम नहीं, उप्र में एक सीमित इलाके में प्रभाव, उग्र हिंदू नेता इसीलिए मोदी को पसंद नहीं करते, लेकिन कुछ ले देकर मोदी के साथ आ जाएंगे।

खंडूरी और कोश्यारी
उत्तराखंड में भाजपा के यह दो बाहुबली हमेशा एक दूसरे के खिलाफ रहे। आडवाणी की तरफ इसलिए क्योंकि मोदी से कुछ हासिल करने की इच्छा। प्रभावी भूमिका के आश्वासन पर मोदी टीम में चले जाएंगे। वैसे इनके विरोध से मोदी- राजनाथ की सेहत पर कोई खास असर नहीं।

आडवाणी बनाम मोदी
यह पहला मौका है जब भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी पार्टी की कार्यकारी बैठक में शामिल नहीं हो रहे हैं। गौरतलब है कि भाजपा की आज से दो दिन की होने वाली कार्यकारी बैठक के में आडवाणी ने तबियत खराब होने की बात कहकर आने से इनकार कर दिया। बताया जा रहा है कि वह नरेंद्र मोदी को लोकसभा चुनाव प्रचार की कमान सौंपने से नाराज हैं।
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