मोहम्मद बिन तुगलक क्‍यों नहीं बन जाती सरकार!

लखनऊ (नवीन निगम)। जब कोई ऐसा आदेश सरकार देती है, जो आपको पसंद नहीं होता, तो आप कहते हैं "लो जारी कर दिया तुगलकी फरमान"। बहुत लोग आज भी सोचते हैं कि मोहम्‍मद बिन तुगलक एक तानाशाह था, जो जनता को दु:ख देने में जरा भी कसर नहीं छोड़ता था। लेकिन अगर आप कभी नकली नोट के शिकार हुए होंगे, या इस लेख को पढ़ने के बाद भविष्‍य में शिकार हुए तो तो यही कहेंगे, "मोहम्‍मद बिन तुगलक क्‍यों नहीं बन जाती हमारी सरकार।"

भारत में जाली नोटों की मार अब गरीब आदमी झेल रहा है। देश से दुश्मनी रखने वाले मुल्कों से अब ऐसे जाली नोट छप कर आ रहे हैं जिन्हें पहचानने के लिए आपको कम से कम तीन चार दिन की ट्रेनिग लेनी होगी। जिस देश में आधी से ज्यादा आबादी अशिक्षित हो वहां जाली नोटों को बारीकी से कौन समझ पाएगा। इस पर देश में नियम यह बनाया गया है कि जैसे ही बैंक ऐसे जाली नोट देखे उसे तुरंत नष्ट कर दें। अब विडम्बना देखिए सरकार कागज की करंसी में यह वादा करती है कि वह इस मूल्य के बराबर सोना देगी। देश में जाली नोट न चले यह जिम्मदारी भी भारत सरकार की है फिर वो कैसे किसी आम नागरिक को इसका दोषी बना सकती है। जबकि उसका दोष केवल इतना होता है कि वह नोट को बारीकी से जांच नहीं पाया।

इसका परिणाम यह होता है कि लोग जाली नोट मिलने पर उसे बैंक में न ले जाकर बाजार में किसी और को चला देते है। इस तरह जाली नोट बाजार में अपना काम करते रहते हैं जिसके लिए उन्हें बनाया गया है। जब किसी के पास पांच सौ या हजार का एक या दो जाली नोट आ जाता है तो वह इसे लेकर न पुलिस के पास जाता है न बैंक के पास। वह इसे अपने पास रख लेता है किसी और को बेवकूफ बनाने के लिए। लेकिन सवाल यह है कि जब कागज की करेंसी चलाई गई तो इस पर नियत्रंण का काम सरकार के पास था जाली नोट रोकने का काम भी सरकार के पास है। तो जाली नोट गलती से पा जाने वाला भारतीय नागरिक उसकी सजा क्यों भुगत रहा है।

क्या सरकार यह समझती है कि दो जाली नोट रखने वाला इस नोट की तस्करी कर रहा है यदि नहीं तो जाली नोट गलती से पा जाने वाले व्यक्ति को भी पीडि़त माना जाना चाहिए और कानून के मुताबिक उसे सरकार की तरफ से मुआवजा मिलना चाहिए लेकिन हो क्या रहा है लोग पीडि़त की जगह मुलजिम बने जा रहे है और वह अपनी गाढ़ी कमाई को ऐसे ही लुटते देख रहे हैं।

इतिहास के झरोखे में नकली सिक्‍के

भारत में लगभग 700 साल पहले दिल्ली के तख्त पर मोहम्मद बिन तुगलक नाम का बादशाह बैठा था उसने पहली बार दिल्ली में सोने की जगह तांबे के सिक्के चलाए जिसका मूल्य सोने के सिक्कों की तरह था, लेकिन टकसाल की उचित व्यवस्था न होने के कारण उसकी योजना फेल हो गई और लोग नकली सिक्के बनाने लगे। जब उसे इसकी खबर हुई तो उसने तांबे के सिक्कों को रोक दी और आदेश दिया कि लोग तांबे के सिक्के (जिनका मूल्य सोने के सिक्कों के बराबर था) लाकर दे जाए और सोने के सिक्के ले जाए। इस आदेश के बाद लोग बड़ी संख्या में सरकारी खजाने में सिक्के जमा करा गए और सोने के सिक्के ले गए।

इसमें वो सिक्के भी शामिल थे जो नकली बनाए गए थे। लेकिन बादशाह का मानना था कि वो सिक्के नकली है तो भी हम इसे सोने के सिक्के से बदलेंगे। क्योंकि सिक्के नकली न बने इसकी जिम्मेदारी भी तो बादशाह (सरकार) की है। कहते हे कि उसका खजाना खाली हो गया और उसके सामने नकली सिक्कों को ढेर लग गया।

मोहम्मद बिन तुगलक की बात यहां इसलिए की जब उस बादशाह ने नकली करेंसी चलने की बात को अपनी नाकामी माना तो भारत सरकार किसी के पास नकली नोट मिलने पर उसे कैसे मुलजिम मान सकती है यदि मुलजिम मानती है तो उसे पकड़े और उस पर जाली नोट की तस्करी करने का मुकदमा चलाए। नहीं तो उसे पीडि़त मानते हुए उसे नकली नोट के बराबर की राशि का भुगतान करें। वनइंडिया पर और भी बेहतरीन फीचर पढ़ें।

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