मुंबई के बिना भी तेज गति से दौड़ रहा गुजरात

अहमदाबाद। गुजरात आज अपना स्थापना दिवस मना रहा है। गुजरात की स्थापना को आज 53 वर्ष हो गए। भारत और चीन के बीच हुए युद्ध के बाद जिस प्रकार लता मंगेशकर ने जरा याद करो कुर्बानी.... गीत को अपने सुर देकर देश की जनता का आह्वान किया था कि वह शहीदों की कुर्बानी को अपने दिलों में संजोए रखे, उसे भूलें नहीं। यह गीत केवल किसी एक युद्ध तक सीमित नहीं हो सकता। हर उस आंदोलन के बाद उसमें आहूति देने वालों को याद करने के लिए प्रेरित करने वाला यह गीत आज फिर याद आ रहा है, क्योंकि जिस खुशहाल गुजरात की दुहाई दी जाती है, वह कड़े संघर्षों और अनेक बलिदानों के बाद अस्तित्व में आया था।

बात पचास के दशक की है। गुजरात के लोगों को अपनी अस्मिता के साथ समझौता मंजूर नहीं था। इसीलिए द्विभाषी राज्य मुंबई के प्रस्ताव के विरुद्ध महागुजरात आंदोलन की आवश्यकता पड़ी। आज जहाँ गुजरात के साम्प्रदायिक ताने-बाने को बार-बार विभिन्न दंगों की दुहाई देकर चुनौती दी जाती है, वहीं गुजरात की स्थापना के लिए हुए आंदोलन में हर धर्म और जाति के लोगों ने एक गुजराती के रूप में भाग लिया था। उस समय गुजरात में हिन्दू-मुस्लिम एकता पूरे भारत के सामने एक मिसाल थी।

भाषाई राज्यों के प्रस्ताव से बनी गुजरात की उम्मीद

स्वतंत्रता के बाद भारत में विविधभाषी जनता की अस्मिता बनाए रखने के लिए भाषाई राज्यों की स्थापना का विचार रखा गया। 1953 में कांग्रेस के हैदराबाद अधिवेशन में भाषाई राज्यों की स्थापना का प्रस्ताव पारित किया गया। बस यहीं से पृथक गुजरात की उम्मीद बंधी। गुजरातियों ने सपना संजोया कि उनका भी अपना एक राज्य होगा, लेकिन पृथक गुजरात की उम्मीदों पर मोरारजी देसाई ने यह कह कर पानी फेर दिया कि बृहद मुंबई राज्य में मुंबई जैसे विविधभाषी शहर को किसी एक राज्य का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता।

देसाई के इस विचार से गुजरात की जनता में रोष फैल गया। केंद्र सरकार ने बीच का रास्ता निकालते हुए महाराष्ट्र, मुंबई और गुजरात नामक तीन राज्यों और तीनों के लिए एक ही उच्च न्यायालय का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव का महाराष्ट्र में गलत संकेत गया। वहाँ के लोगों नो सोचा कि गुजराती लोग मुंबई को महाराष्ट्र से अलग रखना चाहते हैं। 7 अगस्त, 1956 को केंद्र सरकार ने महाराष्ट्र और गुजरात के मतभेदों को देखते हुए गुजरात सहित मुंबई को द्विभाषी राज्य बनाने का फैसला किया। इस फैसले ने अपना गुजरात का सपना संजोए गुजरातियों पर वज्राघात किया, क्योंकि इस फैसले से पृथक गुजरात का सपना चकनाचूर हो गया। यहीं से शुरू हुआ महागुजरात आंदोलन।

मुंबई बिना एक दिन नहीं चल सकेगा गुजरात

मुंबई बिना एक दिन नहीं चल सकेगा गुजरात

मोरारजी देसाई का यह कहना था कि बिना मुंबई के गुजरात एक दिन भी नहीं चल सकेगा। गुजरात टूट जाएगा। विकास ठप हो जाएगा। देसाई के इस मत से गुजरात कांग्रेस के कई नेता असहमत थे, परंतु देसाई के विरुद्ध बोलने का किसी में साहस नहीं था। केंद्र सरकार के इस गुजरात विरोधी फैसले के समय गुजरात कांग्रेस नेतृत्व मूकप्रेक्षक बना रहा, लेकिन जनता में जबर्दस्त प्रतिक्रिया हुई। 7 अगस्त, 1956 को ही कुछ विद्यार्थी अहमदाबाद में भद्र स्थित कांग्रेस हाउस पर पहुँचे और कांग्रेस नेता ठाकोरभाई देसाई से मिले। 8 अगस्त को पूर्ण हड़ताल का आह्वान किया गया।

कांग्रेस हाउस से चली गोलियाँ

कांग्रेस हाउस से चली गोलियाँ

उधर दिल्ली में उसी दिन यानी 8 अगस्त, 1956 को लोकसभा ने द्विभाषी मुंबई राज्य का प्रस्ताव पारित कर दिया। 8 अगस्त का यह दिन गुजरात के लिए काला दिन साबित हुआ। इसके विरुद्ध हजारों छात्र भद्र स्थित कांग्रेस हाउस पर इकट्ठा हुए और केंद्र के विरुद्ध प्रदर्शन करने लगे। इसी बीच कांग्रेस हाउस से गोलियाँ चलीं। इस सरकारी हिंसा में सात से आठ छात्र शहीद हो गए तथा अनेक घायल हुए। इनमें हिन्दू-मुस्लिम दोनों ही कौम के छात्र थे। इस हिंसा के बाद शहर भर में द्विभाषी मुंबई राज्य का विरोध शुरू हो गया। पूर्ण हड़ताल के आह्वान के बीच छात्रों का बड़ा जुलूस खाडिया पहुंचा और माहौल ‘महागुजरात ले के रहेंगे' के नारों से गूंज उठा। 8 और 9 अगस्त को जबर्दस्त दंगे हुए तथा सरकारी सम्पत्तियों में तोडफ़ोड़ व आगजनी की गई। हरिहर खंभोलजा, हरीप्रसाद व्यास तथा प्रबोध रावल ने खुली जीप में शहर का दौरा कर छात्रों से शांति की अपील की। इन दंगों में करीब 12 लोग शहीद हुए और 80 जने घायल हुए। शाहपुर में सरकार विरोधी प्रदर्शन के बीच भडक़ी हिंसा के बाद 10 अगस्त को करफ्यू लगा दिया गया। कर्फ्यू उल्लंघन के दौरान 5 लोग पुलिस की गोली के शिकार हुए तथा 45 घायल हुए।

पूरे गुजरात में फैली आंदोलन की आग

पूरे गुजरात में फैली आंदोलन की आग

अगले दिन 10 अगस्त, 1956 को अखबारों ने स्पष्ट कर दिया कि महागुजरात आंदोलन अब अहमदाबाद तक सीमित नहीं रहा। नडिय़ाद, जूनागढ़, वडोदरा, सायला (सुरेन्द्रनगर), भावनगर, डाकोर (खेडा), पालनपुर (बनासकांठा), बोटाद (भावनगर), सूरत, राजकोट, अमरेली, पारडी (नवसारी), बावला (अहमदाबाद), भुज (कच्छ), आणंद सहित पूरे गुजरात में इसकी गूंज शुरू हो गई। मोरारजी देसाई के प्रति गुजरात के लोगों में भारी गुस्सा था। 19 अगस्त, 1956 को घोषणा हुई कि कांग्रेस हाउस पर मोरारजी देसाई द्विभाषी मुंबई राज्य के अपने मत पर सफाई देंगे। इससे माहौल और गरमा गया। उनकी सभा के दिन पूरे शहर में जनता करफ्यू का ऐलान कर दिया गया। यह ऐलान पूरी तरह सफल रहा। सडक़ें वीरान रहीं, बाजार बंद रहे। देसाई की सभा में कोई नहीं पहुंचा।

इंदूलाल याज्ञिक को बागडोर

इंदूलाल याज्ञिक को बागडोर

अब तक महागुजरात आंदोलन एक निश्चित नेतृत्व के अभाव में अलग-अलग तरीके से चल रहा था। इसे एक निश्चित दिशा देने के लिए 9 सितंबर, 1956 को अहमदाबाद में खाडिया स्थित औदिच्य की वाड़ी में सुबह बड़ी भीड़ जमा हुई और वहाँ महागुजरात जनता परिषद् का गठन किया गया। ब्रह्मकुमार भट्ट इसके संयोजक रहे, लेकिन अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी तेज-तर्रार भाषण शैली के लिए मशहूर इंदूलाल याज्ञिक को सौंपी गई। परिषद् के गठन के बाद आंदोलन को जबर्दस्त गति मिली। याज्ञिक के उत्तेजक भाषणों ने पूरे गुजरात को संगठित बनाया। परिषद् के नेतृत्व में करीब चार साल आंदोलन चलता रहा। धरने-प्रदर्शन-नारेबाजी-लाठीवार-गोलीबारी में कइयों ने प्राणों की आहूति दी और अनेक घायल हुए।

जीवराज मेहता बने मुख्यमंत्री

जीवराज मेहता बने मुख्यमंत्री

अंतत: केंद्र सरकार ने 27 अगस्त, 1959 को लोकसभा में द्विभाषी मुंबई राज्य से पृथक गुजरात के निर्माण का प्रस्ताव रखा। 1957 में हुए चुनाव में कांग्रेस को मिली जीत के बाद यशवंतराव चव्हाण मुंबई के मुख्यमंत्री थे, जबकि जीवराज मेहता वित्त मंत्री थे। लोकसभा में प्रस्ताव पारित हो गया। पृथक गुजरात विधानसभा में कांग्रेस का बहुमत था, अत: जीवराज मेहता को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया गया। जब लोकसभा ने पृथक गुजरात के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी, तब उन्होंने विसनगर (मेहसाणा) में महागुजरात जनता परिषद् की आखिरी बैठक बुलाई और इसे भंग कर दिया। कई लोगों ने परिषद् के जरिए राजनीति में आने की बात कही, परंतु इसे स्वीकार नहीं किया गया।

साबरमती आश्रम में प्रथम मंत्रिमंडल की शपथ

साबरमती आश्रम में प्रथम मंत्रिमंडल की शपथ

17 अप्रेल, 1960 को मुंबई से विशेष ट्रेनों में सचिवालय कर्मचारियों, सैकड़ों टाइपराइटरों, कागज के पार्सलों आदि को अहमदाबाद लाया गया। 19 अप्रेल को लोकसभा ने मुंबई राज्य विभाजन का विधेयक पारित किया गया। 23 अप्रेल को राज्यसभा ने भी इसे मंजूर कर लिया। 25 अप्रेल को गुजरात मंत्रिमंडल की घोषणा हुई। इसी दिन राष्ट्रपति ने विधेयक को मंजूरी दे दी। आंध्र प्रदेश के मेहंदी नवाज जंग को राज्यपाल बनाया गया। 30 अप्रेल को जीवराज मेहता सरकार के स्वागत के लिए अहमदाबाद में लालदरवाजा सरदार बाग में जनसभा हुई और 1 मई, 1960 को साबरमती स्थित गांधी आश्रम में जीवराज मेहता ने प्रथम मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+