कस्तूरबा जयंती : तो बापू बैरिस्टर नहीं बन पाते...

अहमदाबाद। ''इसे बेच कर आप पढऩे चले जाओ।'' पत्नी कस्तूरबा के इस वाक्य ने मोहन की निराशा को मिटा दिया और वे विदेश चले गए। कस्तूरबा ने यदि अपने गहनों का पिटारा पति मोहन को नहीं दिया होता, तो शायद मोहनदास करमचंद गांधी यानी महात्मा गांधी बैरिस्टर नहीं बन पाते।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की अर्धांगिनी के रूप में कस्तूरबा का योगदान, त्याग और बलिदान किसी वीरांगना से कम नहीं है। भले ही उन्होंने दुर्गावती या लक्ष्मीबाई की तरह तलवार नहीं चलाई, लेकिन पति के साथ समूचा जीवन राष्ट्र के प्रति समर्पित करना अपने आप में नारी के त्याग और शक्ति की अद्भुत मिसाल है। महात्मा गांधी मैट्रिक पास करने के बाद विलायत जा कर बैरिस्टर की पढ़ाई करना चाहते थे, लेकिन विलायत जाने का खर्च कहां से उठाते।

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गांधीजी ने अपने पिता के छोटे भाई यानी चाचा तुलसीदास से सहायता मांगी, लेकिन तुलसीदास ने सहायता करने से इनकार कर दिया। महात्मा गांधी चाहते थे कि तुलसीदास उन्हें पोरबंदर राज्य से छात्रवृत्ति ही दिलवा देते, लेकिन यह भी नहीं हुा। आखिर वे निराश हो गए। इधर कस्तूरबाई को पता चला, तो उन्होंने गहनों का पिटारा गांधीजी के सामने खोल दिया। आभूषण बिके और तीन हजार रुपए आए। शेष दो हजार परिजनों व मित्रों से लिए और गांधीजी विलायत रवाना हो गए। वहां से वे बैरिस्टर बन कर लौटे।

छह वर्ष में सगाई, 14 में विवाह
त्याग और बलिदान की प्रतिमूर्ति कस्तूरबा की आज 144वीं जयंती है। 11 अप्रेल, 1869 को पोरबंदर में एक अनुशासित परिवार में जन्मीं कस्तूरबा कापडिया ने पिता गोकुलदास मकनजी और माता व्रजकुमार से बचपन से ही संस्कार, धर्म, दृढ़ संकल्प बल, संयम, सहनशीलता, विवेकक्ति और कर्मनिष्ठा जैसे गुण हासिल किए थे। जब वह छह वर्ष की थीं तभी पोरबंदर नगर के प्रसिद्ध दीवान करमचंद गांधी के पुत्र मोहनदास के साथ उनकी सगाई कर दी गई। 14 वर्ष की आयु में 1883 में उनका विवाह हुआ। महात्मा गांधी के साथ दाम्पत्य जीवन के दौरान कस्तूरबा ने धीरे-धीरे अपनी आकांक्षाओं, अभिलाषाओं और आवश्यकताओं को त्याग दिया और गांधीजी के सिद्धांतों एवं आदर्शों को जीवन में आत्मसात कर लिया। गांधीजी के ब्रह्मचर्य पालन के प्रयोगों की कठोरता को भी कस्तूरबा ने निर्विरोध सहन किया। गांधीजी के मतानुसार ब्रह्मचर्य पालन में कस्तूरबा कभी बाधक नहीं बनीं।

गांधीजी ने किया साक्षर
कस्तूरबा निरक्षर अवश्य थीं, परंतु उन्होंने जीवन में गांधीजी, विनोबाजी, महादेवभाई, किशोरलाल, काका कालेलकर जैसे महानुभावों से काफी कुछ सीखा था। इसीलिए वे गांधीजी के कारावास के दौरान जनसभाओं में जोश भर देने वाला भाषण दे पाती थीं। गांधीजी ने बाद में कस्तूरबा को अक्षरज्ञान के साथ गुजराती भाषा भी सिखाई। कस्तूरबा दिन के 16 घण्टे प्रवृत्तिमय रहती थीं। पति के प्रति पूर्ण पारायण कस्तूरबा ने 1933 से 1943 तक का समय सेवाश्रम के तपोवन में बिताया। 9 अगस्त, 1942 को गांधीजी व उनके सहयोगियों को गिरफ्तार कर लिया गया। उसी दिन कस्तूरबा शिवाजी पार्क में जनसभा को सम्बोधित करने गईं, लेकिन पुलिस ने उन्हें भी गिरफ्तार कर पुणे के आगाखान महल कारावास में डाल दिया।

जेल में देहत्याग करने का सौभाग्य
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अनेक वीरों ने बलिदान किया, परंतु जेल में रह कर मृत्यु का वरण करने का सौभाग्य महादेवभाई देसाई और उनके बाद कस्तूरबा गांधी को ही मिला। 22 फरवरी, 1944 को महाशिवरात्रि के दिन पुणे के आगाखान महल में कारावास के दौरान कस्तूरबा ने पति महात्मा गांधी की गोद में नश्वर देह का त्याग किया।

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