सड़क पर रात बिताने को बेबस है शहीद की विधवा

 Chhattisgarh
रायपुर। देश की सीमा पर अपनी जान की बाजी लगाकर हमारी सुरक्षा करने वाले शदीह का परिवार आज रो रहा है। उनके पास ना तो रहने को घर और ना ही खाने को खाना। बेबसी की हालत में जीं रहा है शहीद का परिवार। छत्तीसगढ़ के राज नांदगांव जिले में 60 साल की शारदा देवी के पास ना तो घर है और ना ही रोटी का ठिकाना है। शारदा के पति दामोदर दास 1984 में देश की सेवा करते हुए सीमा पर शहीद हो गए थे। तब से आज तक वो पेंशन के लिए भटक रही है, लेकिन उनकी गुहार सुनने वाला कोई नहीं । पहले पति को खोया और फिर भोपाल गैस कांड में उन्होंने अपने दोनों बेटे गंवा दिए। उनके पास अब तो खोने के लिए भी कुछ नहीं बचा।

शादरा मजदूरी कर पेट पाल रही हैं, लेकिन आपको जानकर बड़ा अफसोस होगा कि इस शदीह की विधवा का निवास क्षेत्र सूबे के मुख्यमंत्री रमन सिंह के निर्वाचन क्षेत्र में ही आता है। शहीद की विधवा किसी तरह से दिन काट रही है, कभी पड़ोसियों के घर रात गुजारती है तो कभी सड़क पर ही सोना पड़ता है। अपना हक पाने के लिए सरकारी विभागों के चक्कर काट-काट रही शारदा की सूनने वाला कोई नहीं है। पति 1984 में ही शहीद हो गए लेकिन उसे अब तक पेंशन नहीं मिल पाया।

आर्थिक तंगी के चलते अब शारदा की हिम्मत जवाब दे चुकी है, इसलिए अब को इसकी शिकायत तक नहीं करना चाहती, लेकिन टीवी चैनल आजतक पर ये खबर दिखाए जाने के बाद संबंधित अधिकारियों ने इसकी जानकारी ली। अधिकारियों ने भरोसा दिलाया है कि जल्द ही शारदा को उसका हक मिलेगा। लेकिन सवाल अब ये है कि अपने जीवन का अंतिम पड़ाव पार कर रही शारदा को अगर लपेंशन मिल भी जाता है तो उसका अब क्या करेंगी। पति और बच्चे की मौत के बाद गरीब बेवा की गुहार सरकार कब सुनती है और शारदा देवी को उनका हक कब तक मिलता है, यह खुद सरकार के लिए एक बड़ा सवाल है।

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