20 साल से रोज लिख रहे हैं माता-पिता को पत्र, लिमका बुक में दर्ज

लखनऊ। जरा सोचिये उस बेटे के अंदर अपने माता-पिता के लिये प्रेम भाव, जो पिछले 20 साल से हर रोज अपने माता-पिता को पत्र लिखकर भेजता हो। जी हां यह अनूठा काम किया है लखनऊ के श्री जयनारायण पीजी कॉलेज के अध्‍यापक डा. आलोक चांटिया ने। जिसके लिये उनका नाम लिमका बुक आफ रिकार्ड में दर्ज हुआ है।

डॉ आलोक चांटिया, प्रवक्ता मानवशास्त्र, के. के. सी. डिग्री कालेज ने अध्यापन कार्य के साथ साथ अपने सामाजिक दायित्वों को भी पूरा करते हुए एक नया कीर्तिमान रचा और अपना नाम लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्ड में दर्ज कराया। मूल रूप से बहराइच जिले के रहने वाले डॉ चांटिया के माता पिता वहीं रहते हैं और लखनऊ आकर बसे डॉ चांटिया ने अपने माता पिता को यह आश्वासन दिया था कि वो कैसी भी परिस्थिति में रहेंगे पर रोज वो उनको एक पत्र लिखेंगे।

Dr Alok Chantia

एक कठिन से लगने वाले काम को उस समय गंभीरता पूर्वक नहीं लिया गया पर जैसे जैसे साल दर साल बीतते गए और डॉ चांटिया पूरे मनोयोग से अपने माता पिता को पत्र लिखते गए तो उनके साथ जुड़े लोगों ने उनको प्रेरित किया कि क्यों नहीं वो अपने नाम एक रिकॉर्ड दर्ज करवाते हैं और लगातार इस प्रेरणा के कारण जब डॉ चांटिया ने लिम्का रिकॉर्ड से संपर्क किया तो उनको यह जान कर खुशी हुई कि आज तक यह रिकॉर्ड किसी के नाम नहीं है जिसमे एक बेटे ने इतने लम्बे समय तक अपने माता-पिता को पत्र लिखा हो और एक लम्बी प्रक्रिया के बाद डॉ चांटिया का नाम इस रिकॉर्ड के साथ लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्ड में दर्ज हो गया।

यह एक महतवपूर्ण बात है कि डॉ चांटिया ने पिछले 20 साल से ज्यादा समय से रोज अपने माता-पिता को पत्र लिखा पर आरम्भ में रिकॉर्ड के लिए ना सोचने के कारण पत्र को उनके माँ पिता ने ज्यादा संभल कर नहीं रखा जिसके कारण काफी पत्र नष्ट हो गए और जब भी डॉ चांटिया अपने माँ पिता के साथ रहे तब भी उन्होंने पत्र नहीं लिखे।

एक सबसे रूचि की बात यह है कि उत्तर प्रदेश के एक पिछड़े जिले में रहने के कारण जब डॉ चांटिया ने अपनी बहनों को पढ़ने और नौकरी करने के लिए बाहर भेजा तो माँ पिता अकेले रह गए और उन्होंने जब अपने अकेलेपन की चिंता जाहिर की तो डॉ चांटिया ने माँ पिता से कहा कि वो उनसे लगातार जुड़े रहेंगे और रोज पत्र लिखेंगे। उनके इस रिकॉर्ड से आज के दौर में पत्र लिखने की लुप्त होती परम्परा को एक नयी दिशा मिलेगी और युवाओ को यह प्रेरणा मिलेगी कि किस तरह दूर रह कर भी अपने माँ पिता से जुड़ा रहा जा सकता है। फ़ोन करने से उतना मनोवैज्ञानिक असर नहीं पड़ता जितना सामने रहने वाला पत्र रोज अपनों के आस पास रहने का भाव पैदा करता है और डॉ चांटिया इस सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रयोग को करके न सिर्फ दिखाया बल्कि एक रिकॉर्ड भी बना डाला।

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