वो मंजर जब महात्मा गांधी को लगीं तीन गोलियां

"धाँय...धाँय...धाँय..."। बंदूक से तीन गोलियाँ निकलीं। गोलियों की आवाज के बाद अगली आवाज थी ‘‘हे...राम...।" 65 साल पहले आज ही के दिन अहिंसा की प्रतिमूर्ति हिंसा की शिकार हुई थी। 30 जनवरी, 1948 का वह दिन भारत को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति दिलाने के महासंग्राम के महानायक मोहनदास करमचंद गांधी का अंतिम दिन था और मुख से निकला ‘हे राम' अंतिम शब्द था।

गांधीजी ने अपने जीवन के 12 हजार 75 दिन स्वतंत्रता संग्राम में लगाए, परंतु उन्हें आजादी का सुकून मात्र 168 दिनों का ही मिला। नाथूराम गोडसे की बंदूक से निकली तीन गोलियाँ बापू के शरीर को छलनी करती गईं।

पहली गोली- बापू के शरीर के दो हिस्सों को जोडऩे वाली मघ्य रेखा से साढ़े तीन इंच दाईं तरफ व नाभि से ढाई इंच ऊपर पेट में घुसी और पीठ को चीरते हुए निकल गई। गोली लगते ही बापू का कदम बढ़ाने को उठा पैर थम गया, लेकिन वे खड़े रहे।

दूसरी गोली- उसी रेखा से एक इंच दाईं तरफ पसलियों के बीच होकर घुसी और पीठ को चीरते हुए निकल गई। गोली लगते ही बापू का सफेद वस्त्र रक्तरंजित हो गया। उनका चेहरा सफेद पड़ गया और वंदन के लिए जुड़े हाथ अलग हो गए। क्षण भर वे अपनी सहयोगी आभा के कंधे पर अटके रहे। उनके मुंह से शब्द निकला हे राम।

तीसरी गोली- सीने में दाईं तरफ मध्य रेखा से चार इंच दाईं ओर लगी और फेफड़े में जा घुसी। आभा और मनु ने गांधीजी का सिर अपने हाथ पर टिकाया। इस गोली के चलते ही बापू का शरीर ढेर होकर धरती पर गिर गया, चश्मा निकल गया और पैर से चप्पल भी।

छा गई खामोशी

इन तीन गोलियों ने दो सौ वर्षों तक भारत को गुलामी की जंजीर में जकड़े रखने वाले अंग्रेजों को अहिंसक आंदोलन के जरिए झुका देने वाले महात्मा गांधी को हमेशा के लिए खामोश कर दिया। साथ ही मौके पर सन्नाटा छा गया। हर काई स्तब्ध रह गया। कई तो यह जान ही नहीं पाये कि हुआ क्या, लेकिन जब देखा, खून से लतपत बापू जमीन पर पड़े हैं, तो आंसुओं की मानो बाढ़ आ गई। तीन गोलियों ने बापू के तीन दशक के संघर्ष को पूरा कर दिया।

आंधी आंखें खुली हुई थीं

उन्हें बिरला भवन स्थित उनके खंड में ले जाया गया। आंखें आधी खुली हुई थीं। लग रहा था शरीर में अभी जान बची है। कुछ देर पहले ही बापू के पास से उठ कर गए सरदार पटेल तुरंत वापस आए। उन्होंने बापू की नाड़ी देखी। उन्हें लगा कि नाड़ी मंद गति से चल रही है। इसी बीच वहां हाजिर डॉ. द्वारकाप्रसाद भार्गव पहुंचे। गोली लगने के दस मिनट बाद पहुंचे डॉ. भार्गव ने कहा, ‘‘बापू को छोड़ कर गए दस मिनट हो चुके हैं।'' मौके पर मौजूद लोग सिसक-सिसक कर रोने लगे। कुछ देर बाद डॉ. जीवराज मेहता आए और उन्होंने बापू की मृत्यु की पुष्टि की।

रक्तरंजित वस्त्रों से लिपट गये नेहरू

जानकारी मिलते ही पं. जवाहरलाल नेहरू पहुंचे। नेहरू गांधीजी के मृत शरीर के पास घुटनों के बल बैठे और बापू के रक्तरंजित वस्त्र में मुंह डाल कर रुदन करने लगे। इसके बाद गांधीजी के पुत्र देवदास और मौलाना अबुल कलाम आजाद भी पहुंचे।

और फिर अगले दिन

अगले दिन सुबह होते ही गांधीजी के सहयोगियों ने उनकी पार्थिव देह को नहलाया। गले में हाथ से काती हुई सूत की माला और एक अन्य माला पहनाई। ग्यारह बजे गांधीजी के तीसरे पुत्र रामदास नागपुर से पहुंचे। नई दिल्ली के अल्बुकर्क रोड पर से बापू की अंतिम यात्रा शुरू हुई, जिसमें करीब पंद्रह लाख लोग पहुंचे। सायं 4 बज कर 20 मिनट पर बापू की पार्थिव देह यमुना किनारे पहुंची और माहौल ‘महात्मा गांधी की जय' के नारों से गूंज उठा।

जब बापू बोले- अब जीने की इच्छा नहीं

आजादी से पहले 125 वर्षों तक जीने की इच्छा व्यक्त करने वाले बापू स्वतंत्रता और विभाजन के बाद देश में भडक़े साम्प्रदायिक दंगों से निराश हो गए थे। उन्होंने आजादी के बाद 2 अक्टूबर, 1947 को पहली और आखिरी बार मनाए गए जन्म दिन के मौके पर कहा था,‘‘अब अधिक जीने की इच्छा नहीं है। मेरे बोल का वजन नहीं पड़ता है।''

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अक्सर इंसान किसी लक्ष्य के लिए संघर्ष करता है, तो उसका उस लक्ष्य को पाने के बाद उसे भोगने की भी इच्छा रखना भी स्वाभाविक है, लेकिन महात्मा गांधी का जीवन उस इंसान जैसा साबित हुआ, जो पेड़ तो लगाता है, लेकिन उसकी छाँव और फल की अपेक्षा नहीं करता।

दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के बाद स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हुए महात्मा गांधी ने 15 अगस्त, 1947 तक इस आंदोलन में हिस्सा लिया। कुल मिला कर उन्होंने 12 हजार 75 दिन स्वतंत्रता संग्राम को समर्पित किए, लेकिन जिस आजादी के लिए उन्होंने जीवन के इतने दिन (करीब 27 वर्ष) समर्पित किए, उस आजादी की खुली हवा में वे केवल 168 दिन ही सांस ले सके।

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