नरेंद्र मोदी की छलकती सुराही में सुराख!
अहमदाबाद। अहमदाबाद का सरदार पटेल स्टेडियम फिर एक बार गुजरात की छह करोड़ जनता के जनादेश को प्रतिबिंबित कर रहा था। फिर एक बार यह स्टेडियम भारतीय जनता पार्टी और उससे सम्बद्ध एनडीए के बड़े-बड़े नेताओं और मुख्यमंत्रियों की उपस्थिति का गवाह बन रहा था। पाँच साल बाद नरेन्द्र मोदी सरदार पटेल स्टेडियम के मंच से गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे। हालाँकि पाँच साल पहले और बाद के इस नजारे में जनादेश के लिहाज से केवल दो सीटों का फर्क था, लेकिन फिजा के लिहाज से सब कुछ बदला-बदला सा था।
वास्तव में यह समारोह मोदी का शपथ ग्रहण समारोह कम, भारतीय जनता पार्टी और उससे भी एक कदम आगे एनडीए के समक्ष मोदी का शक्ति प्रदर्शन अधिक लग रहा था, क्योंकि मोदी को इस बार स्वयं को एक विराट कद के रूप में प्रस्तुत करना था, लेकिन शक्ति प्रदर्शन रूपी मोदी की इस छलकती सुराही में एक सुराख सबको बार-बार कचोट रहा था।

यहाँ यह याद दिलाने की आवश्यकता शायद नहीं है कि नरेन्द्र मोदी को 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री की उम्मीदवारी के प्रबल दावेदारों में एक माना जा रहा है और गुजरात में लगातार तीसरी बार विधानसभा चुनाव जीत कर मोदी ने जिस तरह अपनी करिश्माई नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया है, उसके बाद तो मोदी की यह दावेदारी और मजबूत हो गई है। बस अब सवाल रह जाता है पहले भाजपा में, फिर एनडीए में उनकी स्वीकार्यता का।
मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में भाजपा के सबसे बड़े नेता लालकृष्ण आडवाणी और अध्यक्ष नितिन गडकरी सहित तमाम भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री उपस्थित थे, तो एनडीए के लिहाज से भी जे. जयललिता, प्रकाश सिंह बादल, ओमप्रकाश चौटाला, उद्धव ठाकरे, रामदास आठवले जैसे कदावर नेताओं की उपस्थिति मोदी के शक्ति प्रदर्शन की गवाही दे रहे थे।
इतना ही नहीं महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के अध्यक्ष और महाराष्ट्र में उद्धव के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले राज ठाकरे सहित सुब्रतो राय सहित अनेक नेताओं-अभिनेताओं की चकाचौंध भरी मौजूदगी तो मानो मोदी की इस सुराही को छलकाने को थी, परंतु इन सबके बावजूद यह छलकती सुराही बार-बार छलकते-छलकते रह जा रही थी। कारण था वहसुराख, जो सबको परेशान कर रहा था।
जी हाँ। हम बात कर रहे हैं बिहार के मुख्यमंत्री नितिश कुमार की। वैसे दो बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने वाले नितिश ने कभी मंच पर मोदी को नहीं बैठाया, तो इस लिहाज से मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में उनकी अनुपस्थिति व्यावहारिक दृष्टिकोण से कोई चौंकाने वाली बात नहीं है, लेकिन बात जब प्रधानमंत्री पद के लिए एनडीए की ओर से दावेदारी की हो रही हो, तो फिर नितिश की अनुपस्थिति मोदी की सुराही में सुराख के समान ही कहलाएगी।
वैसे भी नितिश कुमार और नरेन्द्र मोदी के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता समय-समय पर सामने आती रहती है और इस प्रतिद्वंद्विता के पीछे सबसे बड़ा कोई मुद्दा है, तो वो है मुस्लिम वोट। नितिश और नरेन्द्र के बीच 27 फरवरी, 2002 तक कोई अंटश नहीं थी, लेकिन उसके बाद गोधरा कांड और फिर भड़के गुजरात दंगों ने नितिश के जेहन में नरेन्द्र की छवि मुस्लिम वोट बैंक के प्रति सबसे बड़े खतरे के रूप में घर कर गई और 2004 के लोकसभा चुनाव में वाजपेयी सरकार की पराजय के सबसे कारण के रूप में नितिश ने नरेन्द्र की कथित मुस्लिम विरोधी छवि को ही ठहराया।
हालाँकि नितिश और नरेन्द्र की मुस्लिम वोट बैंक तक सिमटी यह राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता उस समय व्यापक होने लगी, जब मोदी का नाम प्रधानमंत्री के दावेदार के रूप में लिया जाने लगा। 2009 के लोकसभा चुनाव में लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व को लोगों के नकारे जाने के बाद मोदी का नाम मुखरता के साथ लिया जाने लगा, तो नितिश की टीस बढ़ने लगी, क्योंकि यह सभी जानते हैं कि भाजपा के दृष्टिकोण से भले आडवाणी के बाद की पंक्तियों में शामिल नेताओं में मोदी का नाम बहुत ऊपर हो गया हो, परंतु भाजपा के धर्मनिरपेक्ष रूप एनडीए के दृष्टिकोण से नितिश कुमार खुद को सबसे प्रबल धर्मनिरपेक्ष दावेदार के रूप में मानते हैं।
ऐसे में नितिश और मोदी की लड़ाई भाजपा ही नहीं, बल्कि एनडीए के लिए भी गले की फाँस बन सकती है। मोदी को अपनी इस छलकती सुराही में व्याप्त नितिश रूपी सुराख को बंद करना ही होगा। भाजपा के भीतर के सुराख तो फिर भी वे बंद कर लेंगे, लेकिन नितिश रूपी सुराख से निपटना शायद उनके लिए 2014 के चुनाव में चुनाव से पहले की सबसे बड़ी चुनौती हो सकती है।












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