गुजरात के बाबा-बापा-बापू, कोई न कर सका काबू
अहमदाबाद (कन्हैया कोष्टी)। गुजरात में चुनावी दुंदुभि क्या बजी, सबसे पहले बापू उलाचें भरने लगे। फिर बापा ने खुद को स्वघोषित कैप्टन बना दिया और बाबा ने भी खूब अलख जगाई, परंतु नरेन्द्र मोदी रूपी आंधी को कोई काबू न कर सका। गुजरात की जनता ने लगातार तीसरी बार नरेन्द्र मोदी के नाम पर मुख्यमंत्री के रूप में मुहर लगा कर गुजरात के राजनीतिक मैदान में उतरे बाबा-बापा-बापू तीनों को हासिये पर धकेल दिया।
मोदी के समक्ष ये तीनों बी एक बड़ी चुनौती के रूप में उभरे थे, लेकिन यह चुनाव परिणामों ने साबित कर दिया कि यह चुनौती आभासी थी और गुजरात की जनता ने इस भ्रम को तोड़ दिया और स्पष्ट संदेश दिया कि गुजरात के चुनाव में एकमात्र मोदी ही मुद्दा थे। जनता को यही तय करना था कि मोदी को वापस लाना है या नहीं? और उसने अपना जनादेश सुना दिया।
बापा हवे करो खमैया...
गुजराती में कहावत है हवे तो खमैया करो... यानी बस बहुत हो गया, अब शांत हो जाओ। यह कहावत बापा यानी पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल पर सटीक बैठती है। पटेलवाद आधारित राजनीति कर गुजरात में जातिगत समीकरणों के आधार पर चुनावी वैतरणी पार करने की केशुभाई की कोशिश विफल रही है। गुजरात की राजनीति में बापा के नाम से विख्यात केशुभाई ने अपने गढ़ सौराष्ट्र से लेकर दक्षिण गुजरात तक जोर लगाया, परंतु मोदी को काबू नहीं कर सके। केवल मोदी के नाम का सिक्का चला और बापा को लोगों ने खोटा सिक्का समझ कर जीत के मैदान से दूर ही कर दिया। अपने नेतृत्व में गुजरात भाजपा को 1995 व 1998 में दो-दो बार दो तिहाई बहुमत दिलाने का दमखम रखने वाले बापा उम्र के इस पड़ाव में शायद अब 2017 के चुनाव को लेकर ज्यादा आशान्वित नहीं होंगे। वैसे राजनीतिक महत्वाकांक्षा उन्हें 2014 के लोकसभा चुनाव तक सक्रिय रख सकती है, परंतु जब अपने राज्य में कुछ हासिल नहीं हुआ, तो देश से क्या उम्मीद की जा सकती है? देखते हैं, बापा की अगली रणनीति क्या रहती है।

बापू तो भारे करी... पर कर न सके
गुजराती में अक्सर बड़ों को सम्मान देने के लिए बापू कह कर बुलाया जाता है और बापू जैसी उपाधि से सम्मानित लोग अक्सर भारी काम करते हैं। इसीलिए जब वे कुछ भारी काम करते हैं, तो लोग आश्चर्य-उमंग के साथ बोलते हैं बापूए तो भारे करी... (यानी बापू ने तो कमाल कर दिया...), लेकिन गुजरात के बापू यानी पूर्व मुख्यमंत्री शंकरसिंह वाघेला लगातार तीसरी बार ऐसा कोई कमाल न कर सके। मोदी के विराट कद के आगे बापू जैसा भारी-भरकम शब्द छोटा पड़ गया।
2002 में कांग्रेस ने उन्हें गुजरात चुनाव की कमान सौंपी थी और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की आंधी में बापू को मुँह की खानी पड़ी थी। 2007 में बापू की सक्रियता के चर्चे नहीं थे, तो 2012 में कांग्रेस ने उन्हें पुनः गुजरात चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया। मोदी की चुनौतियों के समक्ष बापू खुद ही सफाई देते रहे कि वे ही कांग्रेस के कैप्टन हैं, लेकिन कांग्रेस ने कभी नहीं कहा कि यदि गुजरात में कांग्रेस को बहुमत मिला, तो मुख्यमंत्री वाघेला बनेंगे। बापू स्वघोषित कैप्टन बन कर वास्तव में कमाल कर गए, लेकिन जनता को स्वघोषित नहीं, जन-घोषित कैप्टन पर विश्वास था और यही कारण है कि बापू को मुँह की खानी पड़ी। 2009 के लोकसभा चुनाव में पंचमहाल सीट से परास्त होने के बाद बापू मोदी पर चिढ़े हुए थे, लेकिन यह खीज निकालने की राहत तक उन्हें न मिल सकी।
बाबा साचे ज बाबो सिद्ध थयो...
राहुल गांधी को अक्सर भारतीय राजनीति में राहुल बाबा कहा जाता है। बाबा शब्द वैसे बच्चों के लिए इस्तेमाल होता है और गुजराती में तो बालक को बाबा और बालिका को बेबी कहा ही जाता है। बाबा यानी राहुल गांधी ने भी गुजरात में आकर मोदी रूपी आंधी को रोकने की कोशिश करने की कोशिश की। यहाँ कोशिश शब्द दो बार लिखना पड़ रहा है, क्योंकि राहुल गांधी का चुनाव प्रचार महज खानापूर्ति से ज्यादा कुछ नहीं था। उन्होंने अपनी सभाओं में महज 15 मिनट के भाषण दिए और उसमें भी 10 मिनट तो नेहरू-गांधी कथा सुनाने में गँवा दिए। अब भला 11 साल से गुजरात के जेहन में समाए मोदी के सामने 15 मिनट का भाषण कितना काम आ सकता। नेहरू-गांधी कथा सुना कर राहुल गांधी सचमुच बच्चा ही साबित हुए। स्पष्ट हो गया कि उन्हें अब भी राजनीति करना नहीं आता। जनता की नब्ज पर हाथ रखना उनके बस की बात नहीं है। नेहरू-गांधी की कथाएँ सुनाना आसान होगा, परंतु नेहरू-गांधी तो दूर, इन्दिरा-राजीव या फिर सोनिया जैसा सामान्य करिश्मा भी गुजरात की जनता ने राहुल में महसूस नहीं किया। यह बात आज के परिणामों से साबित हो गई।












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