चुनावी जंग में गुजरात के बापू की 'बळुकाई'

Shankar Singh Vaghela
गुजरात की राजनीति में दबंग प्रकार के नेता माने जाने वाले शंकर सिंह वाघेला यानी बापू फिर एक बार मोदी के खिलाफ मैदान में हैं। बापू की बळुकाई यानी बल-वर्चस्व इस चुनाव में कसौटी पर है। ऐसा इसलिए कहा जा सकता है कि वे एक ओर जहाँ यह चुनाव जीत कर मोदी के खिलाफ अपनी बळुकाई यानी बल साबित करना चाहते हैं, वहीं इस जीत के साथ वे गुजरात कांग्रेस में भी अपना वर्चस्व स्थापित कर सिक्का जमाना चाहते हैं।

1996 तक भाजपा के महत्वपूर्ण और कदावर नेता माने जाने वाले वाघेला हाल में कांग्रेस पार्टी में हैं और हाईकमान ने उन्हें गुजरात चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष पद जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है। अतः गुजरात में मोदी के खिलाफ कांग्रेस ने बापू को ही कमान सौंपी है। बापू को हालाँकि 2002 में भी कांग्रेस ने ऐसी ही जिम्मेदारी सौंपी थी, परंतु उस समय वे मोदी से मात खा गए थे।

बापू की लड़ाई भी मोदी के खिलाफ ही है। वे मोदी से 1995 से नाराज हैं, जब पहली बार राज्य में भाजपा सरकार बनी थी और कथित रूप से मोदी के कारण बापू को मुख्यमंत्री बनने का मौका नहीं मिला था। फिर बापू ने विद्रोह किया, राष्ट्रीय जनता पार्टी यानी राजपा बना कर कांग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री बने और अंततः कांग्रेस पार्टी में विलीन होगए। हालाँकि कांग्रेस में उन्हें जिम्मेदारियाँ तो महत्वपूर्ण दी जाती रहीं, परंतु महत्व लगभग कभी नहीं दिया गया।

विधानसभा चुनाव 2007 में बापू निष्क्रिय-से दिखे, तो 2009 में लोकसभा चुनाव ही हार गए। इसके लिए भी उन्होंने मोदी को ही जिम्मेदार ठहराया। इस तरह यह चुनाव जीत कर बापू मोदी से बदला लेना चाहते हैं, तो दूसरी ओर कांग्रेस में अपनी बळुकाई साबित करना चाहते हैं। अंतिम क्षणों में कपडवंज से नामांकन दाखिल कर बापू ने यह बात साबित भी कर दी कि गुजरात में यदि कांग्रेस को बहुमत मिला, तो वे मुख्यमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार होंगे।

एक ही कुल

अब मोदी-बापा-बापू के कुल की बात कर लेते हैं। इन तीनों का कुल एक ही है। तीनों की पृष्ठभूमि संघ, जनसंघ और भाजपा से जुड़ी हुई है। एक समय ऐसा भी था कि मोदी-बापा-बापू एक साथ बैठ कर पार्टी-संगठन की उन्नति के लिए चिंतन-मनन करते थे। राजनीतिक मजबूरी ने आज इन तीनों को तीन कोनों में धकेल दिया है। देखते हैं बलाबल की इस कसौटी में कौन बाजी मारता है और कौन मात खाता है।

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