केशुभाई पटेल यानी बापा का 'बळापो'

हालाँकि 2007 के चुनाव में भी यह टीस बाहर आने के कगार पर थी, परंतु बापा पार्टी में रह कर ही शांत रहे। हालाँकि प्रयास तो खूब किए, परंतु मोदी के सामने उनकी एक न चली। उल्टे उनके मजबूत गढ़ माने जाने वाले सौराष्ट्र में ही भाजपा को ज्यादा फायदा हुआ। मोदी ने दूसरी बार बहुमत पाया, तो बापा समझ गए और शांत भी हो गए, परंतु मन की टीस शांत नहीं हुई थी। चार सालतक मौन और निष्क्रिय ही रहे बापा। इस बीच सोमनाथ ट्रस्ट की बैठक के दौरान वे मोदी के साथ एक मंच पर भी दिखे, तब लगा कि बापा और मोदी के बीच दूरी कम हो रही है,परंतु वह मात्र आभास ही साबित हुआ।
चुनावी वर्ष यानी 2012 आते ही बापा अपने बळापो के साथ सक्रिय हुए तथा भाजपा से अलग हो नई पार्टी बना डाली। इस चुनाव में बापा जीपीपी नामक पार्टी के साथ मोदी के खिलाफ मैदान में उतरे हैं। उनकी लड़ाई मात्र और मात्र मोदी के खिलाफ है। वे अपने बयानों में कांग्रेस नहीं, परंतु मात्र मोदी को ही निशाने पर लेते हैं। इस तरह कहा जा सकता है कि इस चुनाव में बापा के मन में ग्यारह वर्षों से संग्रहित बळापो कसौटी पर है।












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