मरने की कगार पर यूपी की ‘ससुर खदेरी’ नदी

Bundelkhand's Sasur Khaderi river going to die
फतेहपुर। उत्तर प्रदेश में फतेहपुर जनपद के द्वाबा क्षेत्र में अपने ‘सतीत्व' के लिए चर्चित ‘ससुर खदेरी' नदी मानव समाज की नाहक छेड़छाड़ का शिकार हो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। इस नदी की जलधारा का बहाव बदल कर पड़ोसी गांवों के लोग रेत में खेती-किसानी करने लगे हैं। परिणामस्वरूप भारी भरकम नदी का असली रूप ही गायब हो गया है।

फतेहपुर जनपद के हथगाम इलाके के सेमरामानपुर गांव की जगन्नाथ झील से उद्गमित ‘ससुर खदेरी' नदी कभी बरसात में उग्र रूप धारण किया करती थी। लोगों में मान्यता है कि ‘सतीत्व' के लिए चर्चित इस नदी का जलस्तर तभी घटा करता था, जब पास-पड़ोस के गांवों की महिलाएं झुंड़ में आरती और पूजा-अर्चना कर मान मनौव्वल करती थीं। लेकिन, अब हालात हैं कि भारी भरकम जलधारा सिमट कर नाले में बदल गई है।

सिर्फ झाड़-झाखड़ और खास-फूस

नदी के उद्गम स्थान जगन्नाथ झील में झाड़-झाखड़ और घास-फूस उग आया है। इस ‘ससुर खदेरी' नदी की प्रचलित किंवदन्ती के बारे में सेमरामानपुर गांव की बुजुर्ग महिला दुजिया बताती है कि ‘सैकड़ों साल पहले जगन्नाथ झील के किनारे ऊंचे टीले में जगन्नाथ धाम का एक मन्दिर था। गांव की एक बहू रोजाना तड़के झील में स्नान कर मन्दिर में विराजमान भगवान जगन्नाथ की पूजा करने जाया करती थी, उसका ससुर अपराधी किस्म का था। एक दिन जब बहू मन्दिर में भगवान की पूजा में व्यस्त थी, उसी समय उसका ससुर वहां पहुंच कर अस्मत लूटना चाहा।

वह अपनी अस्मत बचाते हुए भागने लगी, उसका ससुर उसे खदेड़ता चला गया। इस पुजारिन की रक्शा के लिए झील से एक तेज जलधारा निकली थी, जो ससुर-बहू के पीछे-पीछे बह रही थी। थक कर बहू ने कौशाम्बी जिले की सीमा में यमुना नदी में कूद कर जान दे दी। पीछे से बह रही जलधारा ने ससुर को भी यमुना में धकेल दिया, जिससे उसकी भी मौत हो गई थी। तभी से लोग इस नदी को ‘ससुर खदेरी' नदी के नाम से पुकारने लगे।

वह बताती है कि इस नदी का उद्गम स्थान सेमरामानपुर गांव की जगन्नाथ झील है, नदी की जलधारा यमुना नदी में कौशाम्बी जिले के उसी स्थान में गिरती है जहां बुजुर्ग लोग बहू के कूदकर जान देने की बात बताते हैं। ग्रामीणों के मुताबिक, ‘दो दशक पहले तक इस नदी की जलधारा बहुत चैड़ी थी और बरसात में आई बाढ़ से कई गांव प्रभावित हुआ करते थे, अब पड़ोसी गांव के दबंग किसान नदी की जलधारा को बदल दिये हैं और तहलटी के टीलों को जेसीबी मशीन के जरिए रेत में मिलाकर खेती-किसानी कर रहे हैं। पहले लोग नदी को सती का दर्जा देकर पूजा-अर्चना किया करते थे।

कौन बचायेगा इस नदी को?

नदी बचाओ-तालाब बचाओ आन्दोलन के संयोजक और महात्मागांधी अवार्ड से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता सुरेश रैकवार कहते हैं कि नदी और सरोवर प्राकृतिक धरोहर हैं, इन्हें बचाने की जिम्मेदारी मानव समाज की है। यदि व्यक्तिगत स्वार्थ के चलते लोगों में समझदारी न आयी तो जहां एक इस धरोहरों से हाथ धोना पड़ेगा, वहीं पानी के संकट से भी इंकार नहीं किया जा सकता।

वह कहते हैं कि अन्य नदियों की भांति इस नदी का भी अपना अलग महत्व रहा है, लेकिन अब कृषि भूमि के छोटे से टुकड़े के लिए किसानों ने प्राकृतिक सम्पदा को नश्ट करने का कुत्सित प्रयास किया है। सुरेश ने बताया कि शीघ्र ही इस नदी के अस्तित्व को बचाने के लिए एक कार्य योजना बनाकर किसानों को जागरूक किया जाएगा और अतिक्रमण मुक्त कराकर श्रमदान के जरिए नदी की खुदाई का भी काम शुरू कराएंगे।

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