मुंबई के शेर बाल ठाकरे का निधन

ठाकरे की गत 14 नवंबर से तबियत ज्यादा खराब चल रही थी। उन्हें फेफड़ों से संबंधित बीमारी थी। जिसके चलते उन्हें कई बार लीलावती अस्पताल में भर्ती भी कराया गया। उसके बाद उनका इलाज घर पर ही चल रहा था। शाम करीब 4:55 बजे ठाकरे के डॉक्टर डा. जलील ने बाहर आकर मीडिया को जानकारी दी।
ठाकरे के निधन के बाद महाराष्ट्र के सभी थानों पर अलर्ट जारी कर दिया गया है। मुंबई में सुरक्षा के खास इंतजाम किये गये हैं।
शिवसैनिकों ने कई बार हंगामा भी किया। तभी सुबह तड़के उद्धव ठाकरे घर से बाहर आये और उन्होंने कहा कि उन्होंने अभी उम्मीद नहीं छोड़ी है। पीटीआई के हवाले से खबर आयी कि ठाकरे को लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखा गया है।
बाल ठाकरे के निधन के बाद पूरा महाराष्ट्र शोक में डूब गया है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह समेत कई बड़ी हस्तियों ने बाला साहब के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है।
उनके जीवन पर एक नज़र
बाला साहब के लिये हमेशा मुंबई और मराठी सर्वोपरि रहे। उन्होंने करियर की शुरुआत एक नेता नहीं बल्कि कार्टूनिस्ट के रूप में की। 1950 के दशक में वो फ्री प्रेस जर्नल में कार्टूनिस्ट बने। उनके कई कार्टून भारत के टाइम्स के रविवार संस्करण में प्रकाशित किये गये। 1960 में, उन्होंने एक कार्टून साप्ताहिक मार्मिक का शुभारंभ किया। उन्होंने अभियान में यह बाहरी लोगों के बढ़ते प्रभाव को कम करने के लिये मुंबई में मराठी लोगों को गुजराती और दक्षिण भारतीयों के खिलाफ इस्तेमाल किया।
बाला साहब ने 19 जून 1966 को मूल अधिकारों के लिये लड़ने के संकल्प के साथ शिव सेना की स्थापना की। शिवसेना के प्रारंभिक उद्देश्य आप्रवासियों के खिलाफ महाराष्ट्रीयनों के लिए काम की सुरक्षा को सुनिश्चित किया गया। आगे चलकर शिवसेना भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से संबद्ध हो गई। भाजपा शिवसेना गठबंधन 1995 में महाराष्ट्र राज्य विधानसभा चुनाव में सत्ता में आया। उस दौरान ठाकरे ने कोई पद नहीं लिया, पर्दे के पीछे बैठ कर काम किया। उसी दौरान उन्हें रिमोट कंट्रोल की संज्ञा दी गई।
अपने जीवन में कई बड़ी राजनीतिक लड़ाईयां लड़ने वाले बाल ठाकरे ने आगे चलकर पार्टी अध्यक्ष का पद तो छोड़ दिया, लेकिन फिर भी उनकी जगह किसी ने नहीं ली। उनके बेटे उद्धव ठाकरे आज भी कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में काम कर रहे हैं।












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