खुद को गुजरातियों का अपराधी मानते थे जवाहरलाल नेहरू

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ईसवी सन् 1947 के अगस्त माह की 15 तारीख को लाल किले पर भारतीय तिरंगा फहराने वाले पंडित जवाहरलाल नेहरू के लिए प्रधानमंत्री पद किसी कंटीले ताज से कम नहीं था। चहुंओर अव्यवस्था थी। साम्प्रदायिक दंगे भडक़ रहे थे। विभाजन की आग में सारा हिन्दुस्तान तिल-तिल जल रहा था। भारी मशक्कत के बाद देश की गाड़ी कुछ पटरी पर आई, लेकिन समस्याएं कम नहीं हुई थीं। इनमें एक समस्या पृथक गुजरात की भी थी। संसद में द्विभाषी मुंबई राज्य का प्रस्ताव पारित होने से महाराष्ट्र और गुजरात के लोगों में नेहरू तथा कांग्रेस के प्रति कुछ रोष था।

करीब चार वर्ष चले महागुजरात आंदोलन के दौरान प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तीन बार गुजरात आए। मुंबई को लेकर हो रही उठा-पटक के कारण उन्हें पुणे में जहां महाराष्ट्रवासियों का विरोध झेलना पड़ा, वहीं अहमदाबाद और बड़ौदा में गुजरातियों ने उनकी सभा के समानांतर सभा कर विरोध प्रकट किया। दोनों ही राज्य लोकसभा द्वारा पारित द्विभाषी मुंबई राज्य विधेयक की खिलाफत कर रहे थे। पंडित नेहरू ने हर बार नाराज लोगों को यह कह कर मनाया कि लोकतंत्र से ऊपर कोई नहीं है।

क्‍या हुआ 1959 में

पृथक गुजरात की स्थापना से पहले नेहरू 28 नवंबर, 1959 को अहमदाबाद आए। तब तक पृथक गुजरात का मार्ग प्रशस्त हो चुका था। नेहरू प्रसिद्ध कवि नानालाल मुंशी की पुस्तक ‘हरि संहिता' का लोकार्पण करने आए थे। उस दिन कांकरिया स्थित फुटबॉल मैदान पर नेहरू की जनसभा हुई, जिसमें उन्होंने अहमदाबाद समेत समस्त गुजरात के लोगों के समक्ष महागुजरात आंदोलन के दौरान हुए खून-खराबे के लिए स्वयं को अपराधी स्वीकार किया। उन्होंने कहा, ‘‘दो-तीन माह से द्विभाषी मुंबई राज्य के विभाजन की चर्चा हो रही है। मैं तो इतना चाहता हूं कि दोनों क्षेत्रों की जनता शांति से रहे। अंतत: मुझे लगा कि सभी को रास आए, ऐसा रास्ता निकालना चाहिए। इसीलिए हम पांच लोग मिले। इनमें मेरे अलावा पंडित गोविंद वल्लभ पंत, मोरारजीभाई देसाई, उच्छंगराय ढेबर और यशवंतराव चव्हाण थे। हमने तय किया कि द्विभाषी मुंबई राज्य का विभाजन अवश्यंभावी है और गुजरात के लोगों को उनका राज्य मिलना ही चाहिए।''

पंडित नेहरू ने कहा, ‘‘महागुजरात आंदोलन के दौरान पुलिस गोलीबारी सहित जितनी भी हिंसा हुई है, उसके लिए मैं स्वयं को गुजरातियों का अपराधी मानता हूं और साथ ही क्षमा चाहता हूँ।'' उन्होंने जिस विनम्रता से और मधुरता से यह बात कही, जो लोगों के दिलो-दिमाग पर असर कर गई। लोग गद्गद् हो उठे और उनके मन में नेहरू के प्रति पूर्व में बनी गुजरात विरोधी छवि धुल गई। नेहरू के प्रवचन में सच्चे लोकतंत्रवादी व्यक्तित्व का स्वरूप झलक उठा।

पहली बार जब अहमदाबाद आये नेहरू

नेहरू महागुजरात आंदोलन के दौरान इससे पूर्व भी दो बार गुजरात आए। पहली बार वे 2 अक्टूबर, 1956 को गांधी जयंती के अवसर पर अहमदाबाद आए। द्विभाषी मुंबई राज्य के प्रस्ताव के विरुद्ध आंदोलन कर रही महागुजरात जनता परिषद् के तेवर काफी कड़े थे। परिषद् ने नेहरू की सभा के समानांतर कार्यक्रम किया। नेहरू की सभा लालदरवाजा मैदान पर हुई। पंडित नेहरू ने कहा कि गुजरात, महाराष्ट्र, मुंबई अलग हों, यह अच्छा नहीं होगा। पर मैं क्या करूं।

महाराष्ट्र के लोगों ने यह विचार रखा और मैं सहमत हो गया। इसका मुझे अफसोस भी है। उसी दिन कांग्रेस की ओर से आयोजित विद्यार्थी सभा को सम्बोधित करते हुए नेहरू ने कहा कि गुजरात के युवा वर्ग में पृथक गुजरात के लिए जो जोश है, उसे देख कर मैं हर्षित हूं, लेकिन लोकसभा के निर्णय को मानने के लिए मैं स्वयं भी बाध्य हूं। उन्होंने अपने स्वभाव के अनुरूप प्रेमपूर्वक समझाया कि फैसला बदला जा सकता है, परंतु पांच वर्ष इंतजार करना होगा। लोगों के रोष को अपनी प्रेमपूर्ण वाणी से शांत करते हुए नेहरू ने विद्यार्थियों से अपील की कि वे महागजुरात के नारे के साथ जयहिन्द के नारे को न भूलें।

इसके बाद कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में स्पष्ट कहा कि गुजरात की जनता और कांग्रेस नेताओं के बीच सम्पर्क टूट गया है। द्विभाषी राज्य के प्रस्ताव ने गुजरात की जनता में कांग्रेस की छवि को खराब किया है। मैं नहीं चाहता कि कांग्रेस के सांसद मेरा आंख मूंद कर अनुसरण करें। कार्यकर्ताओं को जनता का शत्रु नहीं, मित्र बन कर रहना होगा।

क्‍या हुआ बड़ौदा में

इसके बाद प्रधानमंत्री नेहरू 8 नवंबर, 1958 को बड़ौदा आए। महागुजरात जनता परिषद् ने फिर एक बार समानांतर सभा की। नेहरू की सभा में अपेक्षा से काफी कम लोग पहुंचे, जबकि परिषद् की सभा में पूरा गुजरात उमड़ पड़ा। समानांतर सभा की बात से नेहरू खिन्न हो गए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कोई भी फैसला लोकतांत्रिक ढंग से ही होगा। जोर-जबर्दस्ती से नहीं।

अंतत: केंद्र सरकार ने मुंबई राज्य के विभाजन को मंजूरी दी और पृथक गुजरात तथा महाराष्ट्र के गठन की तैयारियां शुरू हो गईं। पृथक गुजरात की स्थापना से छह माह पूर्व 28 नवंबर, 1959 को नेहरू अहमदाबाद आए और उन्होंने महागुजरात आंदोलन के दौरान पुलिस गोलीबारी में शहीद हुए लोगों के प्रति न केवल संवेदना व्यक्त की, अपितु इसके लिए स्वयं का अपराध स्वीकार किया।

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