साउथ इंडिया में नॉर्थ इंडियंस की दीवाली

Dwali
[अजय मोहन] दीवाली एक ऐसा पर्व है, जिस पर यदि आप अपने शहर से दूर हैं, तो त्‍योहार का सारा मज़ा किरकिरा हो जाता है। अब दीवाली ही ले लीजिये। वैसे तो यह पूरे भारत का त्‍योहार है और देश भर में यह अलग-अलग ढंग से मनाया जाता है। कहीं सिर्फ लक्ष्‍मी माता की पूजा होती है, तो कहीं लक्ष्‍मी गणेश पूजे जाते हैं, और तो कहीं इन दोनों के साथ सरस्‍वती माता का पूजन भी होता है।

इसी तरह अगर कोई नॉर्थ इंडिया और साउथ इंडिया की दीवाली में भी जमीन आसमान का फर्क है। यहां मैं आपको बताने जा रहा हूं, कि नॉर्थ इंडियन दक्षिण भारत में कैसे दीवाली सेलेब्रेट करते हैं। यह लेख मेरे अनुभवों पर आधारित है। मैं लखनऊ का मूल निवासी हूं, और पिछले चार साल से बेंगलूरू में हूं।

1. लक्ष्‍मी-गणेश की मूर्तियां

कहते हैं बेंगलूरु बहुत महंगा शहर है। बात भी सही है। यही कारण है कि मिट्टी की बनीं लक्ष्‍मी गणेश की मूर्तियों के दाम यहां आते ही आसमान छूने लगते हैं। तीन इंच की मूर्ति जिसकी कीमत लखनऊ में 30 से 50 रुपए तक है, वो बेंगलूरु में 170 से 200 रुपए तक मिलती है। वहीं 80 से 100 रुपए तक की मूर्तियां यहां 400 से 500 रुपए तक मिलती हैं। खैर अब कर भी क्‍या सकते हैं। पूजन के लिये जरूरी भी है, लिहाजा जेब ढीली होना स्‍वाभाविक है।

2. चूरा, गट्टा, खील, खिलौने

चार साल बाद मैं इस बार दीवाली पर लक्ष्‍मी माता को गट्टा भेंट करूंगा। वो भी इसलिये क्‍योंकि पिछले सप्‍ताह मैं लखनऊ गया था, जहां से खरीद कर लाया हूं। वरना पिछले तीन साल तक मैंने बेंगलूरु के कई बाजारों में गट्टा चढ़ाउंगा। खीलें और चीनी के खिलौनों की बात करें तो यहां 50 रुपए की 100 ग्राम है, तो वहां 10 रुपए की। चीनी के खिलौने लखनऊ में 40 रुपए के आधा किलो मिल रहे हैं, जबकि बेंगलूरु में 35 रुपए के 100 ग्राम। आसमान छूते दाम दीवाली के पहले ही दिवाला निकाल देते हैं।

3. गुजरिया, हाथी घोड़े, चूल्‍हा चकिया

बचपन से मुझे दीवाली के लिये खरीददारी का बड़ा शौक था। ढेर सारे मिट्टी के खिलौने जो आते हैं। उत्‍तर भारत में लक्ष्‍मी माता की चौकी पर मिट्टी के हाथी, घोड़ा, चूहा, आदि रखने का चलन है। साथ में चूल्‍हा चकिया, फुंकनी, मिट्टी का मकान, गुजरिया आदि भी। इस हाईटेक शहर में सारा शौक पानी में धुल गया। यहां ऐसे खिलौने देखने तक को नहीं मिलते, तो घर लाने की तो दूर की बात है।

4. त्‍योहार की छुट्टी

बेंगलूरु के तमाम बड़ी कंपनियों में दीवाली की छुट्टी नहीं होती है। आप सोच कर हैरान होंगे, लेकिन यह सच है। अगर किसी को छुट्टी चाहिये होती है, तो उसे अप्‍लाई करनी होती है। कई कंपनियों में तो मात्र एक छुट्टी वो भी नरक चौदस की। यानी जिस दीवाली के दिन आपके भाई-बहन यूपी-बिहार में दीवाली मना रहे होते हैं, उस दिन आप यहां काम कर रहे होते हैं। वैसे हम आपको बता दें यही आलम होली पर भी रहता है। कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश में कई निजी कंपनियों में होली की छुट्टी नहीं होती। यहां तक स्‍कूल-कॉलेज भी खुले रहते हैं।

5. पटाखों का धूम-धड़ाका

यदि आप साउथ में रह रहे हैं और आपके मुहल्‍ले में नॉर्थ इंडियंस नहीं रहते हैं, तो आपकी दीवाली निश्चित रूप से फीकी रहेगी। क्‍योंकि यहां के लोग पटाखे नहीं जलाते। यहां नरक चौदस के दिन पूजन होता है और बस, जबकि उत्‍तर भारत में रात भर पटाखों का धूम-धड़ाका रहता है। मैं अगर अपनी बात करूं तो मैं अपनी बिल्डिंग के नीचे खड़े होकर पूरे मोहल्‍ले में अकेला होता हूं, जो अपनी बेटी के साथ पटाखे जलाता हूं। ऐसे में अगर 10 बजे के बाद आपने पटाखे जलाये, तो पड़ोसी गुस्‍सा होने लगते हैं, क्‍योंकि उनकी नींद में खलल पड़ता है।

6. भूल जाइये क्‍या होता है जमघट

मैंने बचपन से सुना था कि जमघट यानी दीवाली के दूसरे दिन यानी परेवा के दिन पढ़ाई नहीं करनी चाहिये, वरना साल भर पढ़ते रहोगे। पूरे उत्‍तर भारत में सरकारी कार्यालयों से लेकर निजी प्रतिष्‍ठानों तक सभी भले ही दीवाली के दिन कुछ देर के लिये खुलें, लेकिन परेवा के दिन जरूर छुट्टी रहती है। लेकिन यहां दीवाली के दूसरे ही दिन सभी को सुबह 6 बजे उठकर ऑफिस के लिये कैब पकड़नी होती है। लखनऊ में मेरे दोस्‍त-रिश्‍तेदार जमघट के दिन रात भर ताश के पत्‍ते और फिर दिन में पतंगबाजी करते हैं, तो मैं यहां ढेर सारा टेंशन लेकर ऑफिस जाता हूं।

यह व्‍यथा सिर्फ मेरे अकेले की नहीं है। उन सभी उत्‍तर भारतीयों की है, जो बेंगलूरु, चेन्‍नई, तिरुवनंतपुरम, हैदराबाद, आदि शहरों में नौकरी कर रहे हैं। बस यही कुछ पल होते हैं, जब ये बड़े-बड़े हाईटेक शहर काटने को दौड़ते हैं।

जरूर पढ़ें- कैसे करें गणेश-लक्ष्मी का पूजन? | पूजन के शुभ मुहूर्त!

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