इस दीवाली भी कुम्हारों से रूठीं लक्ष्मी माता

आलम यह है कि इस पेशे से पुश्तों से जुड़े लोग भी अब घाटे का सौदा मानकर अपने बच्चों को इस व्यवसाय से जोडऩा नहीं चाहते। रहन सहन का तौर-तरीका बदलने के साथ कुम्हारों के चाक की गति भी मद्धिम पड़ गयी है और उनके लिये यह पेशा दिन-ब-दिन भारी बनता जा रहा है। इस धंधे से जुड़े लोगों का कहना है कि मिट्टी के दाम आसमान पर हैं।
रंग भी महंगा है लेकिन लोग दिया आज भी उसी मूल्य पर खरीदना चाहते हैं। वैसे तो इसके ग्राहक काफी कम हैं लेकिन शगुन के दौर पर लोग कुछ दिये खरीदते हैं, उसका भी सही मूल्य नहीं मिलता। कुम्हारी पेशे से जुड़े लोगों का कहना है कि अब इस काम में कुछ नहीं रखा है। अमीर लोग मिट्टी के बर्तन खरीदते नहीं और गरीब सिर्फ दुआ दे सकता है। पुराना शहर के निवासी 80 वर्षीय खुदाब हालात से बेहद दुखी हैं। उन्होंने कहा कि अगर हालात यही रहे तो ज्यादा नहीं बस दस-बीस साल बाद यह काम खत्म हो जाएगा।
कुम्हारी के पेशे से पिछले चालीस साल से जुड़े सुशील का कहना है कि यह धंधा अब काफी महंगा हो गया और लाभ न के बराबर है। उनका कहना है कि बर्तन बनाने के लिए जितनी मिट्टी पहले एक आने में खरीदकर लाते थे उसकी आधी मिटटी भी अब 50 रूपये में नहीं मिलती। बर्तन बनाने, पकाने और रंगाई-पुताई के बाद पहले बर्तन बेचने में अच्छा नफा मिलता था। अब क्या रह गया है, लोगों के रहन सहन के साथ अब सब कुछ बदल गया है।
लोग इस महंगाई में भी लक्ष्मी जी और गणेश जी की मूर्ति का वही पुराना दो-चार रूपये वाला दाम देना चाहते हैं और बिजली की बत्ती की वजह से दिया अब कम ही लोग खरीदते हैं। उन्होंने कहा बाप-दादाओं का पेशा है। इसी का लिहाज करके खुद को घिस रहे हैं। इस कारोबार से तो अब दो जून की रोटी भी नहीं जुट पाती। इसीलिये हमने अपने बच्चों को दूसरा रोजगार करवा दिया है। कुल मिलाकर कभी कु हारों से लिए दिवाली खुशियों की सौगात लेकर आती थी लेकिन अब सिर्फ मायूसी।












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