कश्मीर को बचाने के लिये दिया था बलिदान

सन सैंतालिस में यह स्थिति और भी खराब हो सकती थी अगर कश्मीर के विभिन्न समुदायों के नागरिकों की मदद से भारतीय सेना ने रियासत में घुस आए पाकिस्तानियों का रास्ता रोक कर उन्हें वापस न खदेड़ा होता। दरअसल,स्वतंत्र भारत की सेना को अपना पहला युद्ध जम्मू-कश्मीर के मोर्चे पर ही लड़ना पड़ा। इस युद्ध से कई अप्रतिम बलिदानों की दास्तान जुड़ी हुई है। इस समर में सैनिकों और नागरिकों ने कंधे से कंधा मिलाकर कर हमलावरों का मुकाबला किया। कश्मीर युद्ध में पहला बड़ा बलिदान डोगरा सूरमा ब्रिगेडियर रजिन्दर सिंह का हुआ।
जम्मू के एक राजपूत परिवार में जन्मे रजिन्दर सिंह जामवाल महाराजा हरि सिंह की सेना के प्रमुख पद तक पहुंचे। अक्तूबर सैंतालीस के आखिरी सप्ताह में पाकिस्तानी फौज और काबाइलियों के मिले जुले लश्कर जम्मू-कश्मीर को रौंदते हुये राजधानी श्रीनगर की तरफ बढ़ रहे थे। उनके पास अपेक्षाकृत अधिक गोला बारूद और संख्याबल था। श्रीनगर की ओर बढ़ते दरिंदों के इस दल का रास्ता रोकना उस समय की सबसे बड़ी चुनौती थी। दिल्ली से भारतीय सेना के पहुंचने तक ऐसा करना आवश्यक था।
भारतीय सेना की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार ब्रिगे. रजिन्दर सिंह ने उरी के एक अहम पुल को ध्वस्त कर पाकिस्तानियों की श्रीनगर पहुंचने की योजना को खटाई में डाल दिया। सैन्य नजरिये से इसे उनका मास्टर स्ट्रोकमाना गया। 26-27 अक्तूबर की रात,भारतीय सेना के श्रीनगर हवाई पट्टी पर उतरने से छह घंटे पहले ब्रिगे. रजिन्दर सिंह मातृभूमि की रक्षा करते हुये शहीद हो गए। ब्रिगे. रजिन्दर सिंह जामवाल को स्वतंत्र भारत के पहले सैन्य सम्मान महावीर चक्र से विभूषित किया गया। ब्रिगेडियर सिंह को उनके इस योगदान के लिए रियासत के लोग उन्हें कश्मीर के रक्षक के रूप में याद करते हैं।
विलय के अगले दिन यानि 27 अक्तूबर की सुबह भारतीय फौज की पहली टुकड़ी श्रीनगर पहुंच तो गयी मगर तब तक पाकिस्तानी श्रीनगर के काफी करीब पहुंच चुके थे। इतिहासकार बताते हैं कि पाकिस्तानी हमलावरों की रूचि अगर कश्मीरियों की संपत्ति और स्त्रियों को लूटने में न होती और वे इन कुकर्मों में अपना कुछ वक्त न गंवाते तो भी वे भारतीय सेना के श्रीनगर में उतरने से पहले शहर में घुस जाते। लिहाजा, कहीं उनका रास्ता ब्रिगेडियर राजिंदर सिंह जैसे जांबाजों ले रोका तो कहीं उनका अपना लोभ-लालच-दरिंदगी उनके रास्ते की बाधा बन गया।
कश्मीर को शत्रु के हाथों में जाने से बचाने के लिए श्रीनगर पहुंचने वालों में एक थे मेजर सोमनाथ शर्मा।इनके बाएं बाजू पर उन दिनों प्लास्टर चढ़ा हुआ था। चाहते तो आराम फरमा सकते थे। मगर मोर्चे की पुकार सुनकर हुंकार भरते हुए उन्होंने रणक्षेत्र के मार्ग का वरण किया। उनकी कंपनी को बडगाम में मोर्चा संभाल कर हमलावरों के लश्कर को रोकने का कार्य सोंपा गया। सीमित संसाधनों और छोटी से टुकड़ी के बल पर मेजर सोमनाथ शर्मा ने लगभग सात सौ हमलावरों को कड़ी टक्कर दी।दुश्मन की भारी गोलीबारी की परवाह किए बिना वे खुद मशीनगनों की मैगजीन लोड कर साथियों को थमाने में जुट गए।
मेजर शर्मा ने अपने साथियों को किसी भी कीमत पर दुश्मन को रोके रखने के लिए प्रेरित किया चूंकि उन्हें एहसास था कि मोर्चा छोडने का अर्थ श्रीनगर हवाई पट्टी तश्तरी में रख कर दुश्मन के हवाले करना होगा। तीन तरफ से घिरे होने के बावजूद वे एक एक साथी के पास जाकर उसका उत्साह बढ़ा रहे थे कि दुश्मन का एक गोला उनके बारूद के बीचोंबीच आ गिरा। इस विस्फोट में यह रणबांकुरा शहीद हो गया। अपने मेजर के बलिदान के एक घंटे बाद तक उनके साथी मोर्चे पर डटे रहे और इस प्रक्रिया में हमलावर को श्रीनगर की तरफ बढ्ने से छह घंटे तक रोका जा सका। अदम्य साहस के लिए मेजर सोमनाथ शर्मा को मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से विभूषित किया गया। यह सम्मान पाने वाले वे पहले भारतीय सूरमा बने। तीन नवंबर को हुआ उनका बलिदान सदैव स्मरण रखा जाएगा।
कश्मीर के मोर्चे पर आत्मबलिदान करने वाले सैनिकों और सैन्य अधिकारियों की सूची में अनेक नाम हैं। देश इनके योगदान को कभी नहीं भुला सकेगा। मगर कश्मीर के मोर्चे पर सैनिकों के साथ नागरिकों ने भी जमकर दुश्मन से लोहा लिया। पाकिस्तान को उम्मीद थी कि जेहाद के नाम पर सभी कश्मीरी मुसलमान उसकी फौज के स्वागत में फूलमालाएं थामे पंक्तिबद्ध खड़े मिलेंगे। मगर ऐसा न होना था न हुआ। जम्मू-कश्मीर के हिन्दू,सिख और मुसलमान मिलकर उनके खिलाफ लड़े। नेशनल कांफ्रेंस के बारामूला जिला के उप प्रमुख मीर मकबूल शेरवानी का बलिदान इस संदर्भ में अनूठा था।
शेरवानी शेख अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस का बहुत सक्रिय और सूझ बूझ वाला पदाधिकारी था। एक बार जब जिन्ना बारामूला आए तो इस नौजवान ने द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को चुनौती देते हुए जिन्ना को अपना भाषण बीच में ही बंद करने को विवश कर दिया था। श्रीनगर में भारतीय सेना के पहुंचने के बाद शेरवानी पाकिस्तानियों के कब्जे में जा चुके बारामूला लौट आया। वह चतुराई के साथ दुश्मनों के लश्कर में जा मिला। योजनबद्ध ढंग से उनके मददगार के रूप में उसने पाकिस्तानियों भरोसा जीता और उन्हंे भारतीय फौज और क्षेत्र की सिख बस्तियों की जानकारी मुहैया कराने लगा। शेरवानी द्वारा दी गई गलत सूचनाओं के कारण काबाइली और पाकिस्तानी फौजी घंटों तक इधर-उधर व्यर्थ मंडराते रहे। उनके हाथ पल्ले कुछ नहीं आया और इस भटकाव के कारण उनकी श्रीनगर की और बढ़त में देरी हो गयी। तब तक श्रीनगर का मोर्चा भारतीय फौज कड़े से संभाल चुकी थी।
कहते हैं कि गुस्साये हमलावरों ने अंततः शेरवानी को बंदी बना लिया। कई दिन तक उस पर अमानवीय अत्याचार किए गए। मगर मकबूल को झुकाया न जा सका। आखिर उसे बिजली के एक खंभे से बांध कर उसके हाथों और माथे में लोहे की कीलें थोक दी गईं। शेरवानी इसके बाद भी अडिग रहा और उसने भारतीय फौज के ठिकानों के बारे में कोई भी जानकारी देने से इंकार कर दिया। बेरहम पाकिस्तानियों ने उसके कान,नाक और जीभ काट दिए और आखिर उसे गोलियों से भून दिया गया। शेरवानी का बलिदान 7 नवंबर को हुआ और 12 नवंबर को बारामूला पहुंचे प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने इस जुझारू देशभक्त को भावभीनी श्रद्धांजली दी। शेरवानी सरीखे अनेक नागरिक कश्मीर के युद्ध में अलग अलग जगहों पर देश के काम आए।
इनमे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उन चार स्वयंसेवकों का बलिदान भी उल्लेखनीय है जो कोटली में सेना को मोर्चे पर हथियार पहुंचाने की प्रक्रिया में शहीद हुए। हमारी सेना के हथियार दुश्मन के कब्जे वाले इलाके में जा गिरे थे। सेनाधिकारियों के आवाहन पर आठ स्वयंसेवक यह गोलाबारूद के बक्से वापस प्राप्त करने निकले थे। गोलाबारूद भारतीय सेना के हवाले करने के बाद मिशन से लौटते हुये इनमें से हर एक के कंधे पर इनके एक शहीद साथी का शव भी था।
कुल मिलाकर,यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि कश्मीर युद्ध में कश्मीर के हिन्दू और सिख ही नहीं बड़ी संख्या में मुसलमान भी पाकिस्तान के खिलाफ लड़े थे।बीते पैंसठ साल की पाकिस्तानी साजिशों के बावजूद पाक-परस्त मुसलमानों की संख्या में बहुत इजाफा नहीं हुआ है,यह सत्य किसी से छिपा नहीं। सांप्रदायिक दायरों से उपर उठकर कश्मीर के देशभक्त लोगों को एक बार फिर सन सैंतालिस जैसे जज्बे के साथ पाकिस्तानी साजिशों का जवाब देना होगा। यह असंभव नहीं है चूंकि पाकिस्तानी पैसे पर पलने वाले अलगाववादियों की संख्या और प्रभाव बीते कुछ वर्षों के दौरान धीरे धीरे घटा है। वे छोटे-छोटे मोहल्लों के नेता बन कर रह गए हैं। ऐसे में आज शहीदों के स्मरण के साथ कुछ नए संकल्प लेने की आवश्यकता है।
लेखक परिचय- वीरेन्द्र सिंह चौहान शिक्षाविद् एवं जम्मू-कश्मीर मामलों के अध्येता हैं।












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