गुजरात में केवल दो ‘या’ के भरोसे है कांग्रेस

अहमदाबाद। गुजरात में चुनावी बिगुल बज चुका है। विधानसभा चुनावों की तारीखों की घोषणा के बाद सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और प्रतिपक्ष कांग्रेस चुनाव नैया को पार लगाने में जुट गए हैं। दोनों ही पार्टियों ने अपने-अपने ट्रम्प कार्ड मैदान में उतार दिए हैं। भाजपा की ओर से जहाँ मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ही हुकम का इक्का हैं, तो कांग्रेस के पास स्थानीय स्तर पर कोई बड़ा और प्रभावशाली नेता नहीं है, जो मोदी के मुकाबले टिक सके और जो चंद नेता मोदी के आसपास खड़े होनी की हैसियत भी रखते हैं, तो वे या तो अपने क्षेत्र तक सीमित रहना चाहते हैं या फिर उन्हें व्यापक होने से पार्टी के भीतर वाले ही रोकते हैं। ऐसे में गुजरात में कांग्रेस की चुनावी नैया केवल दो ‘या' पर आकर टिक जाती है। अगर इस ‘या' को अंग्रेजी में कहें तो वह अक्षर बनता है ‘a'।

गुजरात की राजनीति में नरेन्द्र मोदी के आगमन के बाद कांग्रेस की हालत लगातार पतली होती गई है, तो उसके पीछे का कारण गुजरात कांग्रेस का कमजोर संगठन भी है। मोदी के मुकाबले कांग्रेस की कम आक्रामकता और उससे भी बढ़ कर कोई इस विफलता के लिए जिम्मेदार है, तो वह है कांग्रेस का दो ‘या' पर आकर सिमट जाना। अब आप परेशान हो रहे होंगे कि आखिर ये दो ‘या' है क्या? ये दो ‘या' ही है, जिसे गुजरात कांग्रेस अपनी मजबूती मानती है, जबकि यही उसकी सबसे कमजोरी है। ये दो ‘या' कांग्रेस की अकर्मण्यता के परिचायक हैं। जी हां। अब आपको बता ही देते हैं। पहला ‘या' है मीडिया का ‘या' और दूसरा ‘या' है सोनिया का ‘या'।

Gujarat Congress, Depends, Only Two A

दरअसल गुजरात में 22 वर्षों से सत्ता से दूर कांग्रेस इतने लम्बे अरसे बाद भी यथार्थ के धरातल पर उतनी सक्रिय नहीं है, जितनी कि भाजपा और उसके मुखिया तथा ट्रम्प कार्ड नरेन्द्र मोदी। एक तरफ मोदी हैं, जो लगातार गुजरात में रहते हैं, लगातार गुजरात के लिए काम करते हैं, लगातार गुजरात की माला जपते हैं, हर भाषण में गुजरात... गुजरात... का रटन करते हैं और दूसरी तरफ कांग्रेस का सारा काम मैदान-ए-जंग से कोसों दूर प्रेस कॉन्फ्रेंसों यानी की मीडिया तक सिमट जाता है। गुजरात कांग्रेस के नेता टीवी पर जब दिखते हैं, तो पूरी स्क्रिन पर केवल उनका मुँह दिखता है। कैमरा थोड़ा माइनस झूम होता है, तो आसपास दो और चेहरे बैठे होते हैं, जो मीडिया को सम्बोधित करते हुए दिखते हैं। ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है, जब गुजरात कांग्रेस का कोई नेता किसी बड़ी सभा को सम्बोधित करता दिखे। बड़ी सभा के लिए फिर उसी ‘या' को बुलाया जाता है यानी सोनिया गांधी को।

अभी दो दिन पहले ही कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी आईं और उन्होंने विशाल सभा को सम्बोधित किया। क्या ऐसा पहली बार हुआ है, जब सोनिया आई हों और उनकी सभा में इतनी भारी भीड़ उपस्थित हो? ऐसा बिल्कुल नहीं है। जब-जब सोनिया गांधी चुनाव सभा को सम्बोधित करती हैं, भीड़ बिल्कुल ऐसी ही होती है। सोनिया गांधी ने 2002 और 2007 के विधानसभा चुनावों में भी ऐसी ही बड़ी-बड़ी सभाएँ कीं, लेकिन हुआ क्या? भीड़ तो सोनिया बुला लेती हैं, लेकिन इस ‘या' के जाते ही कांग्रेस के नेता उस ‘या' यानी मीडिया की ओर चले जाते हैं। बस बयान जारी करते हैं। उस भीड़ को मत में तब्दील करने की कोशिश नहीं करते। भीड़ आती है। सोनिया को देखती है और कपड़ों से धूल झाड़ कर घर चली जाती है। इधर सोनिया गईं और उधर भीड़ गई।

दूसरी तरफ भाजपा की ओर से मोदी लगातार जनता के बीच दिखते हैं। चुनाव हों या न हों। नरेन्द्र मोदी के कार्यक्रम चलते ही रहते हैं। सभा, सम्मेलन, समारोह और कार्यक्रम लगातार जनता के बीच होते रहते हैं। मोदी केवल 4 घण्टे सोते हैं और बाकी के सारे घण्टे वे काम करते हैं। यहाँ काम की बात हो रही है। अच्छा या बुरा? इसका फैसला तो जनता को ही करना है। बात सक्रियता की है, जो मोदी में है और गुजरात कांग्रेस में नहीं।

गुजरात कांग्रेस केवल उन दो ‘या' के समक्ष ही सक्रिय दिखती है। ऐसे में गुजरात कांग्रेस को गुजरात में यदि मोदी के समक्ष कोई चुनौती खड़ी करनी है, तो गुजरात की धरती से ही वह चुनौती खड़ी करनी होगी। केवल मीडिया या सोनिया रूपी ‘या' के भरोसे कांग्रेस की नैया कैसे पार हो सकती है। यदि ऐसा संभव होता, तो 2002 में भले न सही, लेकिन 2007 में तो कम से कम हो ही जाता। मान लेते हैं कि 2002 में गोधरा कांड के चलते गुजरात साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का शिकार था, लेकिन 2007 में ऐसी कोई बात नहीं थी और 2012 यानी इस बार भी साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का कोई मुद्दा हावी नहीं है। विकास की ही चर्चा है और उसमें जो खोट या कमी है, उसके आरोप हैं। कांग्रेस यदि जोर लगाए और जमीन से जोर लगाए, तो शायद मोदी के लिए चुनौती बन सकती है।

इस बार कांग्रेस के लिए बड़ा मौका भी है। हालाँकि गुजरात का राजनीतिक और चुनावी इतिहास गवाह है कि यहाँ हमेशा दो दलीय रुझान रहता आया है। 1998 के चुनाव में शंकरसिंह वाघेला ने नई पार्टी बनाई थी, लेकिन उसे केवल 4 सीटें मिली थीं। इस बार भी गुजरात भाजपा के कभी भीष्म कहे जाने वाले और पूर्व मुख्यमंत्री केशूभाई पटेल ने गुजरात परिवर्तन पार्टी बनाई है। यदि इतिहास अपने आपको दोहराएगा, तो यह तय है कि बहुमत भाजपा या कांग्रेस में से ही किसी को मिलेगा। कांग्रेस को भाजपा की इस फूट का भी फायदा मिल सकता है, लेकिन बात वहीं आकर ठहर जाती है। एसी वाले कमरों और ऑफिसों से बाहर निकला जाए तब न कुछ होगा। एक तरफ मोदी विवेकानंद युवा यात्रा निकालते हैं और दूसरी तरफ कांग्रेस ने प्रचार के नाम पर मात्र सोनिया गांधी की सभा करवा दी। क्या चुनावी जीत की यही गारंटी है? क्या केवल मीडिया में बयान जारी कर देने मात्र से गुजरात की जनता मोदी पर लगे आरोपों पर भरोसा कर लेगी? जबकि मोदी स्वयं जनता के बीच कांग्रेस के वायदों-बयानों और यहाँ तक कि दिल्ली में बैठे सोनिया-मनमोहन तक की बखिया उधेड़ देते हैं। कांग्रेस के लिए मोदी से निपटने का इन दो ‘या' के उपरांत कोई नया तरीका सोचने का समय आ गया है।

गुजरात में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिले अरसा हो गया। आखिरी बार 1985 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी को बहुमत मिला था और वह भी रिकॉर्ड बहुमत। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के चलते उपजी सहानुभूति लहर में कांग्रेस ने उस चुनाव में 182 में से 149 सीटें हासिल की थी। उसके बाद गुजरात में हुए किसी भी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की सीटों का आंकड़ा 60 से ऊपर नहीं गया। हालाँकि चुनावी हार के बावजूद कांग्रेस ने विजेता पार्टी में फूट, जोड़-तोड़ और राजनीतिक अस्थिरता का फायदा उठाते हुए 1990-95 में चिमनभाई पटेल के नेतृत्व में और 1996-98 के दौरान शंकरसिंह वाघेला के नेतृत्व में सत्ता-सुख प्राप्त किया।

इस प्रकार कुल मिला कर कांग्रेस ने गुजरात में आखिरी बार 1985 में विधानसभा चुनावों में बहुमत हासिल किया था। इसके बाद 1990 में भाजपा-जनता दल गठबंधन, 1995, 1998, 2002 और 2007 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को लगातार दो तिहाई बहुमत हासिल होता रहा है। इस दौरान भाजपा में भी नेतृत्वकर्ता चेहरे बदले, नेता बदले, परंतु कांग्रेस का वनवास खत्म नहीं हुआ। 1995 और 1998 में जहाँ केशूभाई पटेल थे, वहीं 2002 और 2007 में नरेन्द्र मोदी के उदय के बाद कांग्रेस के अस्ताचल सूर्य पर मानो ग्रहण ही लग गया।

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