पवार भूले थप्पड़, चिदंबरम जूता, मनमोहन भी भूल जायेंगे उतरी शर्ट को

यह कोई पहला मौका नहीं है जब सरकार के सामने जनता आक्रोशित हुई हो। जरा पिछले दिनों को याद करते हैं जब कृषि मंत्री शरद पवार को सरेआम सबके सामने थप्पड़ पड़ा था, पूर्व गृहमंत्री पी चिंदबरम की प्रेस वार्ता में जूता फेंका गया था और तो और कांग्रेस के सपनों की कश्ती के उम्मीदवार राहुल गांधी की चुनावी सभा में भी चप्पलें फेंकी गयी थी।
जिन लोगों ने इन कामों को अंजाम दिया था उन सबका यही कहना था कि सरकार ने अपनी गलत नीतियो के कारण महंगाई को बढ़ावा दिया है, अपने तो वो मजे कर रही है लेकिन आम आदमी के लिए दो जून की रोटी भी खाना मुहाल हो गया है। जिन पर बड़ी ही बेबाकी से सरकार ने बयान दिया कि यह सब विपक्ष का किया-धरा है, वो जानबूझकर सरकार के खिलाफ लोगों को भड़का रही है लेकिन चार दिन चर्चा होने के बाद और संसद में निंदा प्रस्ताव लाने के बाद मामला ज्यों का त्यों हो गया।
आज की घटना का जिक्र फेसबुक पर भी धड़ल्ले से हो रहा है, जाने-माने पत्रकारों और पढ़े-लिखे युवाओं ने बड़े ही व्यंगकारी अंदाज सरकार को कोसा है। पी7 के वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेंद्र शुक्ला ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा है कि 'अब तो संभावना है कि सरकार नारेबाजी से ज्यादा जांच इस बात की कराये कि एक आम आदमी शर्ट पहनने की हिम्मत कहां से जुटा सका...सरकार तो हंसते मुस्कराते हर शख्स की जांच करानी चाहिये कि कमरतोड़ मंहगाई करने के बाद भी कैसे कोई हंसने की हिमाकत कर सकता है।'
तो वहीं आईटी में काम करने वाली रश्मि मिश्रा और सुमिता तिवारी ने लिखा है कि अगर आटा-दाल खरीदने मनमोहन खुद बाजार जाते, तो हम देखते कि उनके मुंह से कैसे निकलता कि पैसे पेड़ पर नहीं उगते। एसी कमरे में बैठकर किसी और का लिखा भाषण पढ़ लेना काफी आसान होता है, इससे अच्छा तो आप चुप ही रहा कीजिये।
संतोष कुमार सुमन तो केवल एक चेहरा है, जिस पर पीएम साहब के सिक्योरिटी गार्ड कोई भी आरोप लगा देंगे, लेकिन उस 121 करोड़ की जनता का क्या, जो खून के आंसू रोने को तैयार खड़ी है। तो जिस बात से पूरी आवाम त्राहि-त्राहि करे वो भला देश हित में कैसे हो सकती है, क्या आज के अपमान के बाद मनमोहन सिंह यह बात समझ सकेंगे या फिर जिस तरह पवार अपना चप्पल, चिदंबरम अपना जूता और राहुल अपनी चप्पल भूल गये उसी तरह मनमोहन सिंह भी शर्ट भूल जायेंगे?












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