ममता बैनर्जी के बिना भी यूपीए मजबूत

नई दिल्ली। देश के सियासी माहौल में इस समय जबररदस्त उबाल आया हुआ है वजह है ममता का अपना समर्थन वापस लेना, जिसके चलते कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार अब अल्पमत में आ गयी है लेकिन लोकसभा के आंकड़ो पर गौर फरमाये तो लगता है कि इस समय मनमोहन सिंह के लिए संकटमोचन क्षेत्रीय पार्टियां बन गयी हैं, जिनसे की जोड़-तोड़ यूपीए पहले ही कर चुकी है क्योंकि उसे अंदाजा हो गया था कि तृणमूल उसके साथ कभी भी साथ छोड़ सकती है।

आपको बता दें कि यूपीए के पास लोकसभा में 273 सीट है। अगर ममता की 19 सीटें हटा दी जायें तो यूपीए के पास 254 सीट रह जायेगीं। लेकिन तमाम विरोधों के बावजूद बसपा और राष्ट्रीय जनता दल यूपीए का समर्थन कर रही है। मतलब अगर गणितीय समीकरण देखें तो सीटों का आंकलन होगा

यूपीए(273) - तृणमूल(19) + बसपा(21) + राजद(4) = 279

इसके अलावा यूपीए के साथ मुलायम सिंह की पार्टी सपा भी है जिनके पास 22 सीटें हैं जो कि यूपीए के आंकड़ो को 301 तक ले जाती हैं, जो कि यूपीए को बहुमत साबित करने के लिए काफी है।

यूपीए(273) - तृणमूल(19) + बसपा(21) + राजद(4)+ सपा (22) = 301

हो सकता है कि इस गणितीय जोड़ को यूपीए ने पहले से ही कर रखा है इसलिए ही वो ममता बैनर्जी को मनाने के मूड में नहीं है और बार-बार कह रही है कि वो अपने फैसले से पीछे नहीं हटने वाली है और अगर मध्यावधि चुनाव होते हैं भी तो वो पूरी तरह से तैयार है।

गौरतलब है कि मंगलवार को करीब 8 बजे रात को तृणमूल ने अपनी लंबी बैठक के बाद प्रेस वार्ता करके यूपीए से समर्थन वापसी का ऐलान कर दिया है। ममता ने यह कदम डीजल के बढ़े दामों, गैस को सीमित करने और मल्टी ब्रैंड रीटेल में एडफीआई की मंजूरी से नाराज होकर उठाया है।

ममता इन सारी चीजों के विरोध में हैं उन्होंने फैसला वापस लेने के लिे सरकार को 72 घंटे का वक्त दिया था लेकिन सरकार ने उनकी एक नहीं सुनी इसलिए ममता ने यह कदम उठा लिया।

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