मशीनें जो 2000 हजार गायों का निकालती हैं दूध
डेरी में दुग्ध उत्पादन की बात आते ही अगर आप यह सोचते हैं, कि भारी संख्या में लोग सुबह-सुबह उठकर दूध निकालते होंगे, तो आप गलत हैं। क्योंकि यह काम आदमी नहीं बल्कि मशीनें करती हैं। ये मशीनें एक दिन में करीब 2000 गायों से दूध निकालती हैं। यही नहीं उन्हें चारा भी यही मशीनें खिलाती हैं।
उत्तर भारत मे स्ट्रॉबेरी उत्पादन के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने वाले हरियाणा के हिसार जिले के स्याहड़वा गांव अब अंतराष्ट्रीय स्तर की स्वचालित दुग्ध डेयरी स्थापित करने की दिशा में एक कदम और बढ़ा दिया है। स्याहड़ावा के दलबीर सिंह, जो पेशे से दिल्ली में चार्टड एकांउटेंट हैं, ने अपने पैतृक गांव में 5 एकड़ की जमीन पर 2 हजार गायों की क्षमता की एक स्वचालित दूध डेयरी 'उत्सुक डेयरी' के नाम से स्थापित की है। इस डेयरी में गायों के खाने-पीने से लेकर उनके दूध निकालने तक की प्रक्रिया को मशीनों द्वारा सम्पन्न किया जाता है। इस पूरी डेयरी का संचालन डेयरी प्रबंधक डा. डी.मुरूगानंदम अपने कार्यालय में बैठे ही कम्प्यूटर के माध्यम से करते हैं।

इस तरह फिट की जाती है मशीन
मशीनों द्वारा निकाला गया यह दूध पाईपों के माध्यम से चिलर यूनिट में स्थांनतरित किया जाता है, जहां पर दूध का तापमान 4 डिग्री सैल्सियस रखा जाता है। उन्होंने बताया कि यह पूरा मिल्क पार्लर साफ्टवेयर के माध्यम से नियंत्रित किया जाता है। इस सॉफ्टवेयर के माध्यम से गाय के पूरे झुण्ड को कम्प्यूटर पर बैठ कर ही नियंत्रित किया जा सकता है।

चारा खिलाने की मशीन
यहां सभी गायों को एक-एक ब्लॉक में खड़ा कर दिया जाता है, और यह मशीन हर गाये के सामने चारा डालती हुई आगे बढ़ जाती है। 200 गायों पर यह एक मशीन 40 लोगों का काम करती है।
डा. डी मुरूगानंदम ने डेयरी संचालन की पूरी प्रक्रिया को बताते हुए कहा कि इसकी स्थापना वर्ष 2010 में की गई तथा इस वक्त इस डेयरी में लगभग 200 गायें हैं। डेयरी से वाणिज्यिक दूध उत्पादन प्रक्रिया मई, 2011 से चालू है तथा आज के दिन डेयरी में 1400 लीटर दूध का उत्पादन प्रतिदिन होता है। डेयरी की खासियत के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि उच्च गुणवत्ता के साथ स्वच्छ दूध का उत्पादन करने के उद्देश्य से स्थापित यह डेयरी पूरी तरह से स्वचालित डेयरी फार्म है। डेयरी में दूध निकालने की मशीन जर्मनी से लगभग 90 लाख रुपये की लागत से आयात की गई है। यह मशीन गायों का दूध निकालकर उसे 4 डिग्री सैल्सियस पर ठण्डा रखती है।
उन्होंने बताया कि प्रत्येक गाय में एक माईक्रो चिप लगी हुई है, जिसका डाटा सॉफ्टवेयर में फीड है। सैड से दूध निकालने के स्थान तक आने, इनसे दूध निकालने, निकाले गये दूध की मात्रा, दूध का फ्लोरेट, उसकी इलैक्ट्रिकल कंडक्टिवीटि, पशु में बीमारी, उसको पूरे जीवन काल के दौरान दी गई दवाई, वैक्सिनेशन, फीड तथा अन्य अनुवांशिक जानकारियां इस चिप के माध्यम से सॉफ्टवेयर में लोड रहती हैं, इससे पशु में होने वाली बीमारी का समय से पूर्व ही पता चल जाता है तथा इस बिमारी के बचाव की वैक्सिनेशन प्रक्रिया समय रहते ही कर दी जाती है। इसके कारण डेयरी के सभी पशु स्वस्थ रहते हैं।
मशीनों द्वारा दूध निकालने की प्रक्रिया को बताते हुए उन्होंने कहा कि गाय के थन के साथ मशीन के लगाने के उपरान्त दूध निकल जाने के बाद यह मशीन 12 सैकेण्ड के पश्चात स्वत ही थन से अलग हो जाती है, जिससे दूध के ऑवर ड्रा होने की समस्या नहीं रहती है, इससे गायों कें थनों की सूजन तथा संक्रमण की संभावना नग्णय रहती है। मशीनों द्वारा निकाला गया यह दूध पाईपों के माध्यम से चिलर यूनिट में स्थांनतरित किया जाता है, जहां पर दूध का तापमान 4 डिग्री सैल्सियस रखा जाता है। उन्होंने बताया कि यह पूरा मिल्क पार्लर साफ्टवेयर के माध्यम से नियंत्रित किया जाता है। इस सॉफ्टवेयर के माध्यम से गाय के पूरे झुण्ड को कम्प्यूटर पर बैठ कर ही नियंत्रित किया जा सकता है।
उन्होंने बताया कि गायों को वैज्ञानिक तरीके से नापा हुआ फीड, जिसमें हरा चारा, तूड़ी, फीड, विटामिन, खनिज मिश्रण, बायोपास फैट, बायोपास प्रोटीन, टोक्सिक बाईंडर शामिल हैं, को टोटल मिक्सर राशन (टीएमआर) मशीन में मिलाकर देते हैं। यह मशीन स्वीडन से आयात की गई है तथा इस मशीन में चारे को काटने, इसे नियंत्रित मात्रा में अन्य पोषक तत्वों के साथ मिलाने के साथ-साथ गायों को सीधे उपलब्ध कराने की प्रक्रिया शामिल है।
डेयरी फार्म के संस्थापक दलबीर सिंह ने बताया कि अपने पैतृक गांव में अंतराष्ट्रीय स्तर के इस स्वचालित डेयरी को स्थापित करने का उनका पुराना सपना था। यह डेयरी पूरी तरह से ग्रीन फिल्ड परियोजना है, जिसमें गायों के गोबर से बायो गैस उत्पादित की जाती है। इस बायो गैस से जहां एक तरफ फार्म में कार्य करने वाले अधिकारियों व कर्मचारियों की रसोई की ईंधन की आवश्यकता पूरी होती है, वहीं दूसरी तरफ इस गैस से 20 किलो वाट प्रति दिन बिजली का उत्पादन होता है। इस बिजली से फार्म में 10 घण्टे की बिजली आपूर्ति की जाती है। इसी बिजली से फार्म के संयंत्र संचालित होते हैं। बायो गैस उत्पादन के पश्चात बचे हुए गोबर अर्थात स्लरीस वर्मीकम्पोस्ट (खाद) बनाई जाती है, जो फार्म पर लगाये गये पौधों तथा सब्जियों के खेतों में उपयोग की जाती है। इस तरह से यह फार्म ऊर्जा के क्षेत्र में पूरी तरह से आत्मनिर्भर है।
सिंह ने बताया कि यह डेयरी फार्म 2 हजार गायों की क्षमता के उदेश्य से स्थापित किया गया है, परन्तु इसमें अभी मात्र 200 गाय हैं। ये सभी गाय उत्कृष्ट होल्सिन फे्रशर(एचएफ) नस्ल की हैं। अपनी पूरी क्षमता पर कार्य करने पर इस डेयरी फार्म से उत्पादित बिजली को स्याहड़वा गांव की बिजली की आपूर्ति के लिए उपयोग में लाये जाने की योजना है।
उन्होंने कहा कि इस वक्त डेयरी में मात्र दूध का उत्पादन किया जा रहा है, परन्तु शीघ्र ही 200 गायों के एक अन्य झूण्ड के डेयरी फार्म में आने के पश्चात डेयरी से पनीर की विभिन्न किस्में, घी, दही आदि अन्य उत्पाद भी बनाये जाएंगे, जिन्हें जिला के साथ-साथ राष्ट्रिय राजधानी क्षेत्र में भी बेचा जा सकेगा। उन्होंने कहा कि इस डेयरी फार्म को स्थापित करने का उनका उदेश्य स्थानीय लोगों को कृषि एवं कृषि से जुड़े अन्य व्यवसायों में वैज्ञानिक तकनीक के बारे में प्रोत्साहित करना भी है, जिससे अधिक से अधिक युवा इन तकनीकों को अपनाकर लाभ प्राप्त कर सकें।












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