पुणे सिरियल बम ब्लास्ट: आतंकियों की नाकामी या फिल्म से पहले का ट्रेलर?

आपको बताते चलें कि सूरत में 29 जुलाई को ऐसा ही हुआ था। 29 से लेकर 30 जुलाई तक सिलसिलेवार 22 जिंदा बम बरामद हुए मगर फटा एक भी नहीं। आखिर क्यों? 21 जिंदा बम मिलने के बाद पूरे गुजरात में हाई अलर्ट कर दिया गया। बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां की गईं और आतंकियों का स्लीपर सेल भी खामोश बैठ गया। मगर 25 मई 2011 को हाईकोर्ट के गेट नंबर 7 के पार्किंग में धमाका कर दिया गया। खैर इस धमाके में कोई नुकसान नहीं हुआ लेकिन इसके बाद 7 सितंबर 2011 को दिल्ली हाईकोर्ट के गेट नंबर 5 पर जोरदार धमाका किया गया जिसमें 14 लोगों की मौत हो गई। इससे साफ जाहिर है कि आतंकियों को पहले रेकी/ट्रेलर फिर धमाके को अंजाम देने की आदत सी बन चुकी है।
जाहिर तौर पर पुणे में हुआ ब्लास्ट भी इसी तरफ इशारा कर रहा है। क्या आतंकी किसी बड़ी वारदात की रेकी कर रहे थे या फिर उन्हें हाई इंटेनसिटी का एक्सप्लोसिव नहीं मिल पाया और लो इंटेनसिटी से ही धमाका करना पड़ा? फिलहाल यह एक थ्योरी मात्र है और इसपर नतीजा निकालना जल्दीबाजी ही होगी। सूरत में ठीक उसी इसी तरह बम रखा गया था जैसे कल पुणे में रखा गया। टिफिन बॉक्स, साइकिल यानि वैसी चीजें जिसको एकबारगी कोई भी नजरअंदाज कर दे। आईबीएन 7 न्यूज चैनल पर दिखाये गये खबर की मानें तो ऐसे तरीके इंडियन मुजाहिदीन अपनाती है। वो बदनाम आतंकी संगठन जो धमाकों के लिए छोटी और शक के दायरे में न आनेवाली चीजों का इस्तेमाल करता है। ऐसे में दूसरा सवाल यह कि क्या बमों को कहीं और ले जाया जा रहा था?
इस थ्योरी को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ये भी तो हो सकता है कि बमों को रखने का इरादा कहीं और था लेकिन जल्दबाजी और हड़बड़ी में ये तय वक्त और तय जगह से पहले ही फट गए। जबकि सूरत में 21 जगहों पर बम रखे गए और फटा एक भी नहीं। यानि सूरत, दिल्ली और पुणे की तस्वीरों को मिलाकर तुलना करें तो दो बातें उभरकर सामने आ रही हैं। पहली संभावना जल्दबाजी हो सकता है। सूरत की तरह जल्दबाजी की वजह से पुणे में साजिश अंजाम तक नहीं पहुंच पाई और दूसरी संभावना दिल्ली हाईकोर्ट धमाकों की तरह पुणे में दहशत की रिहर्सल। और अगर इस संभावना में दम है तो खतरा टला नहीं है। साजिश के ऐसे कई और बम हो सकते हैं जो तैयार हों किसी जगह पर फटने के लिए और बेगुनाहों के खून से जमी को भिगोने के लिए।












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