टीम अन्‍ना ने कहा भ्रष्‍टाचार में डूबे हुए हैं चिदंबरम

P Chidambaram
दिल्‍ली (ब्‍यूरो)। टीम अन्‍ना ने पहले दिन तीन नेताओं का चिठ्ठा खोला। मनमोहन सिंह, पी चिदंबरम और कपिल सिब्‍बल। मनमोहन सिंह पर आरोपों को पढ़ने के लिये क्लिक करें PREVIOUS पर और सिब्‍बल के बारे में पढ़ने के लिये क्लिक करें NEXT.

ये है टीम अन्‍ना के आरोपों की कॉपी जो वनइंडिया आपके सामने प्रस्‍तुत कर रहा है-

टीम अन्‍ना कहती है- श्री पी. चिदंबरम हमारे देश के गृहमंत्री हैं। जब पी. चिदंबरम वित्त मंत्री थे तो उनके अधीनस्थ प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग ने इस देश के सबसे बड़े हवाला व्यापारी हसन अली के मुख्य साथी काशीनाथ तापुरिया के खिलाफ जांच की और 20 हजार करोड़ रूपये की टैक्स चोरी का मामला बनाया। एक तरफ हमारे वित्त मंत्री श्री पी चिदंबरम इनकी टैक्स चोरी पकड़ रहे थे और दूसरी तरफ उनकी धर्मपत्नी नलिनी चिदंबरम, तापुरिया के वकील के तौर पर उसे कलकत्ता हाईकोर्ट में बचाने की कोशिश कर रही थीं।

प्रश्न उठता है कि हमारे देश के वित्त मंत्री और गृहमंत्री के बीवी-बच्चे हवाला डीलरों और हथियारों के दलालों का इस तरह से संरक्षण करेंगे तो इस देश की सुरक्षा का क्या होगा? इतने गंभीर आरोपों के बावजूद इन मामलों में जांच तक नहीं हुई है। आखिर जांच कराएगा कौन? सारी जांच एजेंसियां तो पी. चिदंबरम के नियंत्रण में आती हैं। इसके अलावा भी हमारे गृहमंत्री पर भ्रष्टाचार के कई गंभीर आरोप लगे हैं:

1. 2जी घोटाला: श्री पी. चिदंबरम पर आरोप है कि उन्होंने ए. राजा के साथ मिलकर देश के 2जी स्पेक्ट्रम को कौडि़यों के भाव बेच डाला। श्री पी. चिदंबरम के आचरण की जांच हो, इसके लिए मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

वर्ष 2008 में 2जी स्पेक्ट्रम कई निजी कंपनियों को दिए गए थे। जिस तरह से कोयला और दूसरे खनिज पदार्थों का भंडार सीमित है उसी तरह से 2जी स्पेक्ट्रम भी सीमित हैं। खनिज पदार्थों की तरह 2जी स्पेक्ट्रम भी राष्ट्र के लोगों की संपत्ति है न कि किसी की निजी संपत्ति। खनिज पदार्थों और 2जी स्पेक्ट्रम का इस देश के विकास के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए था। लेकिन तथ्य और घटनाएं यह दिखाते हैं कि तत्कालीन वित्तमंत्री श्री पी चिदंबरम और तत्कालीन टेलीकॉम मंत्री श्री ए. राजा ने मिलकर देश के लोगों की संपत्ति 2जी स्पेक्ट्रम को मनमाने ढंग से निहायत ही सस्ते में कुछ कंपनियों को पफायदा पहुंचाने के लिए बेच डाला। यह काम उन्होंने सारे कानून ताक पर रख कर किया।

वित्तमंत्री होते हुए श्री पी. चिदंबरम की यह जिम्मेदारी थी की वो 2जी स्पेक्ट्रम को अधिक से अधिक दामों पर बेचे ताकि देश को इससे अधिक फायदा होता, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उनके नीचे काम करने वाले वित्त मंत्रालय के कई अपफसरों ने बार-बार उनसे कहा कि 2जी स्पेक्ट्रम की खुले में नीलामी की जाए जिससे देश को बेहतर दाम मिल सके। लेकिन श्री पी. चिदंबरम अड़े रहे।

श्री चिदंबरम साहब का कहना था कि 2जी स्पेक्ट्रम 4.4 तक का स्पेक्ट्रम 2001 के दामों पर बेचा जाए। 2001 में यह 1650 करोड़ रूपये में बेचा गया था।

उसके बाद टेलिकॉम सेक्टर में भारी तेजी आई और सात साल में महंगाई भी बहुत बढ़ गई। ऐसे में हमारे देश का वित्त मंत्री 2008 में कोई वस्तु 2001 के दामों पर बेचने की जि़द्द करता है तो शक होता है कि दाल में कुछ काला है। उनके नीचे काम करने वाले अपफसरों ने बार-बार कहा कि इसकी नीलामी की जाए। अपफसरों ने हिसाब लगाकर बताया कि अगर नीलामी की गई तो देश को 1650 करोड़ रूपये की बजाय कम से कम 5700 करोड़ रूपये मिल सकते हैं।

हद तो तब हो गई जब एक ऐसे ईमानदार अफसर को 8 अप्रैल 2008 को बुलाकर डांटा गया और उसको फाइल पर लिखी ये सब बातें बदलने को कहा गया। मन में प्रश्न उठता है कि आखिर चिदंबरम जी ने 5700 करोड़ की चीज़ 1650 करोड़ रूपये में क्यों बेची? ऐसा नहीं कि उन्हें पता नहीं था। फाइलें बताती हैं कि उन्हें सब कुछ पता था। अफसरों ने बार-बार स्पेक्ट्रम की नीलामी करने के लिए कहा, लेकिन बार-बार उन्होंने अफसरों की बात ठुकरा दी। वर्ष 2008 में ही 4.4 से 6.2 मेगा हर्ट्ज स्पेक्ट्रम दिया जाना था।

चिदंबरम साहब बार-बार फाइल पर लिखते रहे कि 4.4 तक का स्पेक्ट्रम 2001 के दामों पर बेचा जाए और उससे ज्यादा स्पेक्ट्रम की नीलामी की जाए। यहां तक कि 21 अप्रैल 2008 को भी उन्होंने फाइल पर यही लिखा। लेकिन तीन दिन के अंदर ही वह अपनी बातों से पलट गए। 24 अप्रैल 2008 को ए. राजा और चिदंबरम की मीटिंग हुई जिसमें दोनों ने मिलकर 4.4 मेगा हर्ट्ज से 6.2 मेगा हर्ट्ज कंपनियों को मुफ्त में दे दिया।

ऐसा उन्होंने क्यों किया? क्या ये देश की संपत्ति की खुली लूट नहीं थी? इन बातों को कोई भी सुनेगा तो यही कहेगा कि दोनों की नीयत खराब थी। उनके अपने अपफसरों के आंकलन के मुताबिक 6.2 मेगा हर्ट्ज की कीमत कम से कम 8 हज़ार करोड़ रूपये होनी चाहिए थी। दोनों मंत्रियों ने मिलकर इसे जानबूझ कर 1650 करोड़ रूपये में बेच डाला। क्या दोनों को सख़्त से सख़्त सज़ा नहीं मिलनी चाहिए?

ज़ाहिर था कि अगर किसी कंपनी को इतने सस्ते में 2जी स्पेक्ट्रम दिया जाएगा तो वह कंपनी उसे आगे अध्कि दामों में बेचकर भारी मुनाफा कमा सकती है। 30 जनवरी 2008 को राजा और चिदंबरम की मीटिंग हुई और उसमें यह शंका जाहिर की गई। यह तय हुआ कि इसे रोकने के लिए सख़्त कदम उठाए जाए। उनकी इस बात से सापफ जाहिर था कि उन्हें पता था कि वह 2जी स्पेक्ट्रम बहुत ही सस्ते दामों में बेच रहे हैं। दूसरा उन्हें यह भी आभास था कि कई कंपनियां इसे तुरंत बेचकर इसका पफायदा उठायेंगी। ये तय हुआ कि अगर कोई कंपनी ऐसा करती है तो, कंपनी को हुए मुनाफे का एक हिस्सा सरकार को देना होगा। स्वान और यूनिटेक कंपनियों ने यह कर दिखाया।

स्वान टेलिकॉम ने 23 सितंबर 2008 को और यूनिटेक ने 29 अक्टूबर 2008 को अपने-अपने कंपनियों के शेयर बेच डाले। उन्होंने अपने-अपने शेयरों के माध्यम से स्पेक्ट्रम बेच डाला। मज़े की बात यह है कि दोनों को उस समय तक स्पेक्ट्रम मिला भी नहीं था, मिलने वाला था। यानि स्पेक्ट्रम मिलने की उम्मीद को बेचा गया। इस उम्मीद की भी बाज़ार में बहुत अध्कि कीमत थी। अब भी चिदंबरम साहब चाहते तो कुछ कर सकते थे। वित्त मंत्रालय और टेलिकॉम मंत्रालय के निर्णयों के मुताबिक उन्हें इन कंपनियों से हुए फायदे का हिस्सा सरकार के लिए मांगना चाहिए था। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि उनकी तो नीयत ही खराब थी।

उन्होंने तो खुलकर कंपनियों को सपोर्ट किया और कहा कि कंपनियों ने कुछ गलत नहीं किया है। इतनी बड़ी घटना हो जाने के बावजूद दो साल तक सीबीआई ने इसमें जांच तक शुरू नहीं की। सीबीआई ने कार्रवाई तब शुरू की जब सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को कड़ी फटकार लगाई। इसके बावजूद सीबीआई ने राजा को तो गिरफ्तार कर लिया लेकिन चिदंबरम के खिलाफ कोई जांच तक शुरू नहीं की गई।

सीबीआई के सभी अधिकारियों की ट्रांसफर, पोस्टिंग और प्रमोशन चिदंबरम साहब के हाथ में है। ऐसे में चिदंबरम साहब की जांच करने का साहस कौन करेगा? उन्हें दंड कौन दिलाएगा? उन्होंने देश को खुलेआम लूटा। तथ्य सारे देश के सामने हैं। लेकिन इस देश में एक भी एजेंसी ऐसी नहीं है जो चिदंबरम साहब के गलत कारनामों की जांच करके उन्हें दंड दिलवा सके। इससे घोर सत्य सामने आता है कि हमारे देश के मंत्री इस देश को जितना चाहे लूटें, उनके खिलापफ आरोपों की निष्पक्ष जांच करने और उन्हें दंड दिलवाने की हमारे देश में कोई वाजिब व्यवस्था ही नहीं है।

2. सनएयर होटल मामला: श्री एस.पी. गुप्ता सनएयर होटल, कनॉट प्लेस के मालिक हैं। उन पर निम्नलिखित आरोप लगे हैं:-

-उन पर आरोप है कि उन्होंने श्री राजीव गांधी और श्रीमती सोनिया गांधी के फर्जी लेटरहेड इस्तेमाल किए।
- उन पर आरोप है कि उन्होंने कई सांसदों की ओर से फर्जी पत्र ज़ारी किए।
-उन पर आरोप है कि उन्होंने कॉरपोरेट अपफेयर्स मंत्रालय की 21 पफाइलें चोरी की।
- इसके अलावा उनपर धेखाधड़ी और अन्य कई फ्रॉड के मामले हैं।

दिल्ली पुलिस ने समय-समय पर उनके खिलाप़फ मामले दर्ज किए हैं:-

क) FIR No. 90/2000 ख) FIR No. 99/2002 ग) FIR No. 148/2002 घ) FIR No. 315/2005

इन सभी मामलों में दिल्ली पुलिस ने जांच करके कोर्ट में इनके खिलापफ मुकदमे दायर किए। सभी मामलों में चार्जशीट दायर हो चुकी है। इन मामलों में श्री एस.पी. गुप्ता थी और चार्जशीट खारिज करवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक जा चुके हैं। लेकिन हर जगह उनकी हार हुई। दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को पहली नज़र में पर्याप्त सबूत नज़र आए और उन्होंने श्री श्री एस.पी. गुप्ता के खिलाफ जांच जारी रखने और मुकदमा चलाने के आदेश दिए।

श्री एस.पी. गुप्ता को बचाने के लिए और उनके खिलाफ चार्जशीट खारिज करवाने के लिए श्री पी. चिदंबरम 4 मार्च 2003 को श्री एस.पी. गुप्ता के वकील बनकर दिल्ली हाईकोर्ट में उपस्थित हुए। चूंकि श्री एस.पी. गुप्ता के खिलाप़फ काप़फी सख़्त सबूत थे। दिल्ली हाईकोर्ट ने श्री पी. चिदंबरम की दलील मानने से मना कर दिया और आदेश दिया कि श्री एस.पी. गुप्ता के खिलाप़फ मामला बनाया जाए।

किस्मत देखिए, 30 नवंबर 2008 को श्री पी. चिदंबरम देश के गृहमंत्री बन गए। जिस मामले को वह कोर्ट में नहीं जीत पाए वह मामला उन्होंने गृहमंत्री बनकर खारिज कर दिया। गृहमंत्री बनने के कुछ दिनों के अंदर श्री एस.पी. गुप्ता ने उनके मंत्रालय में चिट्ठी लिखी और उनके खिलाफ दायर चारों मामले खारिज करने की विनती की। श्री पी. चिदंबरम ने खुलेआम अपने पद का दुरुपयोग करके दिल्ली सरकार को चार में से तीन एपफआईआर खारिज करने के आदेश दिए।

भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत यह सीधे-सीधे पद के दुरुपयोग का मामला बनता है। अगर श्री पी. चिदंबरम आम इंसान होते तो अभी तक उनके खिलाफ मामला दर्ज हो गया होता। लेकिन देश की सारी जांच एजेंसियां और सारे पुलिस अधिकारी, जिस शख्स के अधीन और नियंत्रण में हों उनके खिलाफ कौन जांच करेगा? उन्हें कौन सज़ा दिलवाएगा?

अगर हमारे गृहमंत्री और पूर्व वित्त मंत्री पर इतने गंभीर आरोप लगे हैं जिनका सीधे-सीधे हमारे देश की सुरक्षा से संबंध है, तो इसकी तुरंत जांच होनी चाहिए। लेकिन फिर से यही बात उठती है कि जांच कराएगा कौन? हो सकता है कि श्री पी. चिदंबरम साहब के खिलाफ लगे सारे आरोप निराधर हों, लेकिन यह भी हो सकता है कि शायद ये आरोप सच हों? अगर ये आरोप वाकई सच हैं तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हमारे देश की सुरक्षा के साथ कितना बड़ा खिलवाड़ हो रहा है। क्या आपको नहीं लगता कि जब तक जांच होकर सच जनता के सामने न आ जाये तब तक ऐसे व्यक्ति को देश का गृहमंत्री नहीं रहना चाहिए।

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