फंड के लिए भारत का 10 अरब देना गलत नहीं : पीएम

PRIME MINISTER
विपक्ष की आलोचना को खारिज करते हुए प्रधानमंत्री मनमाहेन सिंह ने आज कहा कि यूरो जोन के आर्थिक संकट से निपटने लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष आईएमएफ द्वारा सृजित 430 अरब डॉलर के बेल आउट पैकेज में भारत द्वारा 10 अरब डॉलर का योगदान दिए जाने में उन्हें कुछ गलत नजर नहीं आता ।

सरकार के निर्णय का बचाव करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि इस सहायता का उपयोग जरूरत पड़ने पर ही किया जाएगा और यह देश के भंडार में शामिल रहेगा । अपने आठ दिन की विदेश यात्रा से वापसी के दौरान मनमोहन ने कहा, मुझे नहीं लगता कि आईएमएफ का सहयोग करने में कुछ गलत है ।

इस सहायता का उपयोग केवल आवश्यकता पड़ने पर ही किया जाएगा और यह भारत के भंडार में शामिल होगा । जी-20 सम्मेलन के दौरान यूरो जोन आर्थिक संकट से निपटने के आईएमएफ द्वारा सृजित 430 अरब डॉलर के बेल आउट पैकेज में भारत द्वारा 10 अरब डॉलर की सहायता देने की घोषणा करने के बाद मनमोहन सिंह की काफी आलोचना की जा रही है ।

गौरतलब है कि प्रधान मंत्री कि इस पहल का उद्देश्य डगमगाती विश्व अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करना और वित्तीय संकट को फैलने से रोकना था। आपको बताते चलें कि यह राशि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की तरफ से दी जाने वाली अतिरिक्त 430 अरब डॉलर के कोष में दी जाने वाली थी वहीँ अपने दिए गए संबोधन में प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने विश्व के नेताओं से कहा था कि , 'अंतरराष्ट्रीय मुदा कोष को यूरो क्षेत्र को स्थिर करने में महत्वपूर्ण सहायक भूमिका निभानी है। सभी सदस्य देशों को निश्चित रूप से मदद करनी चाहिए ताकि आईएमएफ अपनी भूमिका निभा सके। मुझे यह घोषणा करते हुए खुशी हो रही है कि आईएमएफ के अतिरिक्त 430 अरब डॉलर की मदद राशि में भारत ने 10 अरब डॉलर का योगदान करने का निर्णय किया है।' जी-20 देशों का दुनिया के कुल जीडीपी में 80 प्रतिशत योगदान है।

इससे पहले, भारत ने प्रोत्साहन राशि देने का संकल्प जताया था लेकिन यह नहीं बताया था कि वह वास्तव में कितनी राशि देगा। चीन के उप वित्त मंत्री झु गुआंगयो के अनुसार ब्रिक्स देशों ने यूरो क्षेत्र की मदद के लिए 60 अरब डॉलर का योगदान देने का संकल्प जताया है। बिक्स में भारत और चीन के अलावा ब्राजील, रूस तथा दक्षिण अफ्रीका हैं। आईएमएफ कोष से कर्ज के पुनर्भुगतान में समस्या झेल रहे देशों को मदद मिलेगी लेकिन यूरो क्षेत्र के नेताओं पर जी-20 देशों का सुधारों को आगे बढ़ाने का दबाव है ताकि भविष्य में इस प्रकार के वित्तीय संकट से बचा जा सके।

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