सरकार नहीं आम लोग ही बचा सकते हैं मासूमों का बचपन

Nandita Das
लखनऊ। बाल शोषण का निकृष्टतम रूप वह है जब बच्चे अपना बचपन खोकर, श्रमिक का कठिनाइयों और जोखिम भरा जीवन जीने को विवश हों। भारत ने लगभग 20 वर्ष पूर्व बच्चों के अधिकार (सीआरसी) सम्बंधी समझौते को स्वीकार किया था। बाल श्रम में लगे बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए सिर्फ सरकार ही अकेले प्रयास नहीं कर सकती लोगों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। जब तक आम लोग अपनी जिम्मेदारी का अहसास नहीं करते मासूम बचपन इसी तरह कुचला जाता रहेगा। यह कहना है प्रसिद्ध अभिनेत्री एवं युनिसेफ की बाल अधिकारी की पक्षकार नंदिता दास का।

उत्तर प्रदेश सरकार तथा युनीसेफ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में बाल अधिकारों पर चर्चा की गयी। युनिसेफ के अधिकारियों ने कहा कि भारत में मासूमों पर भारी अत्याचार हो रहे हैं। शिक्षा का अधिकार, 14 वर्ष के नीचे के प्रत्येक बच्चे के लिए आवश्यक तथा नि:शुल्क शिक्षा का वादा करता है। एक कड़वी सच्चाई यह है कि भारत में 14 वर्ष के नीचे बाल श्रमिक की संख्या, विश्व भर में सबसे अधिक है। पूरे भारत में, उत्तर प्रदेश सबसे अधिक श्रमिकों की संख्या के साथ असहज स्थिति में है। विद्यालय ना जाने वाले ये बच्चे बालश्रम सहित, किसी न किसी तरह के शोषण से जूझ रहे हैं।

सभी देशों में ने 12 जून को विश्व बालश्रम विरोध दिवस के रूप में स्वीकार किया है। यह वह दिन है, जब हम इस सामाजिक बुराई जो बच्चों को शोषण रोकने की शपथ ली जाती हैं। युनीसेफ की बाल अधिकार पक्षकार तथा अभिनेत्री नंदिता दास ने ने कहा कि बच्चों की स्थिति में सुधार के लिए सभी को प्रयास करना होगा तभी तस्वीर बदल सकेगी। नंदिता दास अपने काम के माध्यम से कामकाजी बच्चों के मुद्दे को लगातार उठाती रही हैं।

युनिसेफ के इस अभियान के इस वर्ष का विषय है- आशा और गरिमा। कार्यक्रम में शैलेश कृष्णा, प्रमुख सचिव श्रम ने कार्यक्रम में आए बच्चों से बात की तथा संस्था को आश्वासन दिया कि वह बच्चों के लिए चलायी जाने वाली हर योजना में सहयोग देंगे। इस अवसर पर डा. हरशरण दास राज्य श्रम आयुक्त ने सरकार की ओर से चलायी जा रही योजनाओं की जानकारी दी। यूनिसेफ उत्तर प्रदेश की प्रमुख एडिल खुर्द ने कहा कि यह सुनिश्चित करने के लिए कि बच्चों के सभी अधिकार उन्हें मिलें हमें यह समझना होगा कि ये अधिकार अलग-अलग बंटें हुए नहीं हैं। ये सभी आपस में जुड़े हैं। किसी एक अधिकार के पूरा न होने की स्थिति में दूसरे अधिकारों को सुनिश्चित करने में कई चुनौतियां आती है।

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