सेना विवाद ने खोली यूपीए सरकार की पोल: आडवाणी

आडवाणी ने अपने ब्लॉग में लिखा, यदि कोई चार अप्रैल की खबर और पांच अप्रैल को प्रकाशित अन्य संबद्ध खबरों को विस्तार से पढ़े तो उसे यह मानना होगा कि यह खबरें बेहद चिंताजनक हैं। उन्होंने भाजपा प्रवक्ता की इस राय से सहमति जताई कि सेना और सरकार के संबंद्ध सर्वकालिक निचले स्तर पर हैं।
आडवाणी के अनुसार, इससे यह पता चलता है कि इन दिनों संस्थागत हलकों में आपसी विश्वास की किस कदर कमी हो गई है। हालांकि आडवाणी ने इस बात पर राहत जताई कि इंडियन एक्सप्रेस की खबर में खुद ही इस बात का ध्यान रखा गया है कि इस समाचार का कोई गलत मतलब न निकाला जाए।
आडवाणी ने लिखा है कि इस खबर को छापने का मकसद जिज्ञासा से ज्यादा और कुछ नहीं था। भाजपा नेता ने हालांकि इस मौके पर पूर्व गृह मंत्री बूटा सिंह की आलोचना करते हुए 1989 के एक वाकए को याद किया जब चुनाव में कांग्रेस के हारने और राजीव गांधी के प्रधानमंत्री पद से बेदखल होने के बाद लोकसभा भंग किए जाने से पहले उन्होंने सेना को बुलाने का प्रयास किया था।
आडवाणी ने कहा, उपराज्यपाल भंडारी इस मामले में खुद को निर्दोष बता सकते हैं, लेकिन तत्कालीन केन्द्रीय गृह मंत्री बूटा सिंह इससे इंकार नहीं कर सकते कि उन्होंने एक कपट जाल के आधार पर सेना को बुलाने की चाल की शुरूआत की थी। उपराज्यपाल की गवाही से यह साबित भी हुआ।
आडवाणी ने कहा कि उनके मित्र और पड़ोसी दिल्ली के पूर्व उप-राज्यपाल विजय कपूर ने राजीव गांधी के हारने पर सेना बुलाने की बूटा सिंह की कोशिश की घटना के बारे मैं उन्हें विस्तार से बताया था। कपूर उस समय दिल्ली के मुख्य सचिव थे।
दिल्ली के तत्कालीन उप-राज्यपाल रोमेश भंडारी की आत्मकथा में उस घटना के उल्लेख के हवाले से आडवाणी ने कहा कि अजित सिंह और अन्य द्वारा हरियाणा तथा पश्चिम उत्तरप्रदेश से लाखों किसानों को गोलबंद करके उनके दिल्ली कूच करने और संसद एवं राष्ट्रपति भवन का घेराव करने की अफवाहों के आधार पर बूटा सिंह ने उप-राज्यपाल पर तुरंत कार्रवाई करने का दबाव बनाया था। भाजपा नेता ने कहा कि राजीव के हारने पर बूटा सिंह लोकसभा भंग करने से पहले सेना को बुलाना चाहते थे और वह भी मनगढंत कहानी के आधार पर।












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