मौत का इंतजार की पीड़ा पर सवाल उठाए सुप्रीम कोर्ट ने

Afzal Guru
दिल्ली (ब्यूरो)। मौत की सजा का इंतजार कर रहा आदमी किस पीड़ा से गुजरता है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए हैं। मौत की सजा पाने वाले आतंकी देवेंदर पाल सिंह भुल्लर ने दया याचिका में देरी के आधार पर फांसी को उम्रकैद में तब्दील करने की मांग की है।

इस पर कोर्ट ने कहा कि क्या मौत की सजा पानेवालों की मनोदशा पर कोई रिसर्च की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने आतंकी देवेंदर पाल सिंह भुल्लर की ओर से दायर याचिका पर यह सवाल पक्षकारों से पूछा है। शीर्ष अदालत ने कहा कि किसी भले आदमी ने यह जानने की कोशिश जरूर की होगी कि उस बकरे के मन में क्या चल रहा होता है जो अपनी गर्दन काटे जाने की कतार में शामिल रहता है और कसाई को अन्य को काटते हुए देखता है। यह इंतजार उसके लिए किस तरह की प्रताड़ना होता है।

जस्टिस जीएस सिंघवी व जस्टिस एसजे मुखोपाध्याय ने केंद्र सरकार को 18 दया याचिकाओं से संबंधित विस्तृत ब्यौरा देने का निर्देश दिया है। इसमें संसद पर हमला करने वाले दोषी अफलज गुरू का मामला भी शामिल है। उसकी दया याचिका राष्ट्रपति के समक्ष लंबित है। पीठ ने जाने-माने अधिवक्ता राम जेठमलानी से लिखित में यह जानकारी देने को कहा कि क्या राष्ट्रपति दया याचिका पर फैसला लेते समय पूरे विवेकाधिकार का प्रयोग करती हैं। दरअसल अदालत यह जानना चाहती है कि सरकारों की भूमिका महज सलाह देने तक सीमित रहती है और अंतिम फैसला राष्ट्रपति की ओर से लिया जाता है। पीठ ने यह निर्देश मौत की सजा पाने वाले आतंकी भुल्लर की उस याचिका पर दिया जिसमें दया याचिका में देरी के आधार पर फांसी को उम्रकैद में तब्दील करने की मांग की गई है।

सर्वोच्च अदालत ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल हरेन रावल से मौत की सजा पाने वाले 18 दोषियों से संबंधित दस्तावेज पेश करने को कहा, जिनकी दया याचिका के निपटारे में एक से सात साल तक की देरी हो चुकी है। भुल्लर की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता केटीएस तुलसी ने पीठ से कहा कि 1997 से 2011 के बीच राष्ट्रपति की ओर से 32 दया याचिकाओं का निपटारा किया गया। इनमें से 13 पर दस साल बाद फैसला लिया गया जबकि अन्य 14 के निपटारे में चार से दस साल का समय लगा। शेष पर एक से चार साल के बीच में निर्णय लिया गया। इससे पहले जेठमलानी ने पीठ से कहा कि दया याचिका के निपटारे में एक दिन की भी देरी नहीं होनी चाहिए क्योंकि देरी होने से दोषी व्यक्ति के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन होता है। उन्होंने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा में 302 के तहत हत्या मामले में अधिकतम सजा मौत की होती है। लेकिन यह सजा देने या दया याचिका के निपटारे में देरी दोषी को अतिरिक्त सजा देना है। कानूनी तौर पर प्रक्रिया में लगने वाले समय को स्वीकृति नहीं प्रदान की गई। इस पर पीठ ने पूछा कि दया याचिका में देरी पर दोषी की मनोदशा से संबंधित कोई रिसर्च की गई है।

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