सचिन से संन्यास मांगा लेकिन राजनेताओं से नहीं क्यों?
लेकिन कोई देश के उन सांसदो या विधायकों से सवाल नहीं पूछता कि वो लोग रिटायर कब होंगे जिनके पैर कब्र में लटक रहे हैं। हमारे देश के नेताओं पर गौर फरमाया जाये तो आधे से ज्यादा लोग 70-80 बरस के बीच में हैं। सरकारी सेवाओं में भी 60 साल उम्र रखी गयी है रिटायरमेंट होने की। क्योंकि कहीं ना कहीं यह मान लिया गया है साठ साल के बाद का व्यक्ति मानसिक और शारीरिक रूप से फिट नहीं होता अपनी सर्विस के लिए। उसे सेवाएं देने की जरूरत नहीं बल्कि सेवायें लेने की जरूरत होती है।
लेकिन हमारे राजनैतिक तंत्र में रिटायर होने की प्रथा ही नहीं है। जिसकी वजह से जिन लोगों के पैर कब्र में लटक रहे हैं वह भी अपनी कुर्सी का मोह नहीं छोड़ पा रहे है। जिसकी वजह से हर जगह कुर्सी की लड़ाई चल रही है। आखिर सचिन से एक ही सवाल सौ-सौ बार पूछने वाले लोग क्यों नहीं देश के बूढ़े राजनेताओं से जाकर पूछते कि वो कब संन्यास ले रहे हैं ?
वो नये जोश और नई ऊर्जा को मौका दें ताकि देश प्रगति और विकास के रास्ते पर चल सके। लेकिन यहां उल्टी बात होती है। जहां सचिन को संन्यास लेने के लिए इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि उनकी वजह से कोई युवा चेहरा आगे नहीं आ पा रहा है वहीं दूसरी ओर राजनीति में बुजर्ग लोगों को गद्दी पर इसलिए बैठाया जाता है कि उनका अनुभव देश के लिए काम आयेगा।
सोचने वाली बात यह है कि जो इंसान पूरी तरह से फिट है और खेलने की इच्छा रखता है उससे रिटायरमेंट मांगा जा रहा है वहीं दूसरी ओर जिनसे ठीक से ना तो चला जाता है, ना ही बोला जाता है उनसे देश को चलाने की बात कही जाती है। अब आप ही बताइये कि क्या यह न्याय संगत है? हमारे देश में उल्टी प्रथा क्या नहीं चल रही है?
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