पटरी से उतरा नरेंद्र मोदी के खिलाफ अभियान

Narendra Modi
किशोर त्रिवेदी

गुडविल मिशन? इमेज बिल्डिंग? लोगों के बीच सामंजस्‍य और प्रगाढ़ रिश्‍ता? नरेंद्र मोदी के सद्भावना उपवास पर ढेर सारे सवाल दागे गये। अब सभी राजनीतिज्ञों और कटाक्ष करने वालों के मुंह पर ताला लग गया है। क्‍योंकि गुजरात हाई कोर्ट ने सद्भावना उपवास और उस पर हुए खर्च के खिलाफ उठे सवालों से भरी जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने कहा है कि यह मित्रभाव और विश्‍वास कायम करने के लिए किया गया था!

मुख्‍य न्‍यायाधीश न्‍यायमूर्ति भास्‍कर भट्टाचार्या और न्‍यायमूर्ति जेबी पार्दीवाला ने काफी अहम बातें उठायीं, जो सीधे तौर पर गुजरात-विरोधी तत्‍वों के खिलाफ संदेश देने के लिए काफी हैं। उन्‍होंने पाया कि सद्भावना, नाम मित्रभाव और विश्‍वास पैदा करने के लिए राज्‍य सरकार द्वारा शुरू किये गये एक अभियान का नाम था। सद्भावना मिशन के दौरान मुख्‍यमंत्री ने राज्‍य के हर कोने में चक्‍कर लगाये और लोगों से मिले। कार्यक्रम के अंतर्गत जनता को लोगों के लिए सरकार की योजनाओं के बारे में अवगत कराया गया। इसलिए कोर्ट ने स्‍पष्‍ट रूप से कहा कि सद्भावना मिशन का उद्देश्‍य अच्‍छा था।

कोर्ट ने नुकसान पहुंचाने वाली दृष्टि से भी देखा, जिसमें यह तय करना था कि सद्भावना उपवास पर हुआ खर्च मुख्‍यंत्री वाहन करे या भाजपा। सही तौर पर कोर्ट ने देखा कि यह निर्वाचकों के लिए था कि अगले चुनाव के लिए उनके समक्ष एक अच्‍छी छवि का निर्माण कर सकें। गुजरात के मामले में निर्वाचकों ने एक नहीं तीन बार नरेंद्र मोदी के प्रति अपना विश्‍वास व्‍यक्‍त किया है।

न्‍याययिक हस्‍तक्षेप के सवाल पर कोर्ट ने कहा कि कोर्ट का हस्‍तक्षेप करना तभी सही है, जब सरकार असंवैधानिक रूप से काम कर रही हो। इस केस में किसी भी चर्चा के लिए विधानसभा कोर्ट से ज्‍यादा अच्‍छा फोरम है। स्‍पष्‍ट रूप से कोर्ट ने इस मामले में कि सद्भावना मिशन 'राजनीति से प्रेरित था' पर कोई भी बात सुनने से इनकार कर दिया।

कोर्ट का यह निर्णय उस मोदी-विरोधी ब्रिगेड के लिए शिष्‍ट संदेश है, जो सद्भावना मिशन को गंदे रंगों से रंगना चाहते थे। दो बार सद्भावना उपवास में मैं जा चुका हूं, मैं पूरे विश्‍वास के साथ कह सकता हूं कि यह मिशन 'राजनीतिक दिखावे' से कहीं ऊपर था। एक दाना मुंह में लिये बगैर नरेंद्र मोदी पूरे दिन स्‍टेज पर रहे और इस प्‍लेटफॉर्म पर मानवता के समुद्र बहा दिया। अमीर या गरीब, पुरुष या महिला, सवर्ण बक्‍शी पंच, आदिवासी, मुस्लिम या ईसाई सभी के मन में मोदी और गुजरात के मन में एक समान भाव दिखाई दिया, वही गुजरात जो मोदी ने उनके लिए तैयार किया है।

सद्भावना उपवास के दौरान जो ऊर्जा मुझे मिली उससे मैं विस्मयाभिभूत हो गया। जैसा कि नरेंद्र मोदी बार-बार कह रहे थे कि अगर आपको जनता-जनार्दन का ईश्वरत्व देखना है तो उसके लिए यह स्‍थान है! हजारों गांवों से 50 लाख लोग इस मिशन में शामिल हुए। हजारों लोगों ने नरेंद्र मोदी के साथ उपवास रखा और हजारों लोग कई किलोमीटर पैदल चलकर आये। भुखमरी के खिलाफ सभी सद्भावना उपवासों में भारी समर्थन हासिल हुआ। 10,00 तिथि भोजन का आयोजन किया गया, जिसमें 42 हजार गरीब बच्‍चों का पेट भरा। बालिका शिक्षा के लिए 4 करोड़ रुपए दिये गये। इतना प्‍यार और एकता भारत के इतिहास में हमें कहां मिलेगा?

याचिकाकर्ता का ओछापन कोर्ट द्वारा सामने लाया गया- इस प्रकार की याचिकाएं देश में सिर्फ सत्‍ता को तोड़ने के लिए होती हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि कोई भी सीएजी सद्भावना मिशन की प्राणशक्ति पर सवाल नहीं उठा सकती, राज्‍य सरकार का यह कार्यक्रम जनहित में है।

याचिकाकर्ता, जो मुकदमा हार गया (संयोग से वो एनसीपी से ताल्‍लुक रखता है, उसका खुद का रिकॉर्ड भी अच्‍छा नहीं है) ने कहा कि वो सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगा। मुझे पक्‍का विश्‍वास है वो और उसके आका यह जानते हैं कि यह मामला अब कोर्ट के निर्णय या कुछ सौ वोटों के पार चला गया है। जो मैंने देखा वो है गर्व का स्‍थान, जो महत्‍वाकांक्षा और उत्‍साह से भरा था और विकास की इस यात्रा का एक अंश था। किस भारतीय राज्‍य में ऐसा हुआ है? मुझे इसका उत्‍तर अभी खोजना है। अगर हमें नरेंद्र मोदी का आंकलन करना है तो हमें वस्‍तुनिष्‍ठ होना होगा, हमें उनका आंकलन उनके काम के आधार पर करना चाहिये। उन्‍होंने अपनी मजबूती को अपने लोगों से हासिल की है, न कि नियोजित याचिकाकर्ताओं से या बढ़ा-चढ़ा कर लिखी गई मीडिया की खबरों से।

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