बर्ड फ्लू का असर- काले कौओं के बीच मौत का तांडव

पिछले कुछ समय से एक साथ बड़ी संख्या में कौवों की मौत के कारणों को जानने की अब तक कोशिश तक शुरू नहीं हो पाई है। कौवों की मौत के लिए किसी अनजान बीमारी को कारण माना जा रहा है, लेकिन सरकारी तौर पर इसकी जांच नहीं होने से सहीं कारणों का पता भी नहीं लग पाया है। इसकी बर्ड फ्लू होने की भी आशंका जताई जा रही है। पिछले कुछ समय से एक साथ बड़ी संख्या में कौवों के मरने की घटनाएं बढ़ रही हैं।
झारखंड में जमशेदपुर, रांची व बोकारो में बड़ी संख्या में कौवे मृत पाए गये। इसके बाद बिहार के भागलपुर में यही घटना हुई। दिल्ली में भी पिछले दिनों बड़ी संख्या में कौवे मृत पाए गये। केंद्रीय पर्यावरण व वन मंत्रालय ने यह कहकर पल्ला झाड़ दिया है कि उसका काम जंगलों के वन्यजीवों को लेकर है और गांव व शहरों के पक्षियों को लेकर स्थानीय प्रशासन ही कुछ कर सकता है। अलबत्ता, दिल्ली सरकार ने पर्यावरण मंत्रालय को सचेत करते हुए कहा कि उसे भी अपने वन क्षेत्र में देखना चाहिए कि वहां कौवों में यह बीमारी तो नहीं फैल रही है।
यह बातें लगातार सामने आती रही हैं कि प्रदूषण व बदलती जीवन शैली के कारण चिड़िया खासतौर पर गौरेया भी संकट में है। शहरों से गौरेया गायब होने की राह पर है। भारत में चिड़ियों की लगभग 86 प्रजातियां पहले ही संकटग्रस्त सूची में शामिल की जा चुकी हैं। अब कौवा भी संकट में है। नेपाल के पशु स्वास्थ्य निदेशालय ने स्वीकार किया है कि सुनसारी जिले में बर्ड फ्लू के मामले सामने आए हैं। बड़ी संख्या में यहां कौए इस रोग के कारण मर गए हैं।
नेपाल में पहली बार बर्ड फ्लू का मामला जनवरी 2009 में सामने आया था। दो साल पहले पूर्वी नेपाल में मुर्गियों और बत्तखों में बर्ड फ्लू का वायरस मिला। इसके बाद दिसंबर 2011 में कुछ मुर्गियों के रहस्यमयी ढंग से मरने के बाद एक बार फिर शक जाहिर हुआ। बर्ड फ्लू के मामले चीन, इंडोनेशिया और वियतनाम में भी सामने आ रहे है। डॉक्टरों के मुताबिक चीन और वियतनाम में सामने आया बर्ड फ्लू का वायरस पहले से ज्यादा शक्तिशाली और खतरनाक है।












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