माओवादियों को मिलेगा लाखों का ईनाम

नक्सलियों के खिलाफ सालों से चल रही सुरक्षा बलों की कार्रवाई और कई केंद्रीय योजनाओं के बावजूद मन मुताबिक नतीजे नहीं मिलने के चलते केंद्र सरकार ने यह फैसला लिया है। गृह मंत्रालय ने समर्पण करने वाले नक्सली को दो से तीन लाख रुपये देने की योजना पर मुहर लगा दी। इस योजना के तहत अगर वह नक्सली सुरक्षा बलों से लूटे हुए हथियार के साथ समर्पण करता है तो उसे तीन से पांच लाख रुपये अलग से दिए जाएंगे। इसके तहत एके-47 और स्टेन गन जैसे हथियार के लिए तीन लाख और एलएमजी जैसे भारी हथियार के लिए पांच लाख रुपये की रकम तय की गई है।
इतना ही नहीं अगर समर्पण करने वाले नक्सली पर इनाम की रकम घोषित है तो वह रकम भी उसे ही दे दी जाएगी। सरकार को उम्मीद है कि इस योजना से नक्सली समाज की मुख्यधारा में आने के लिए तत्परता दिखाएंगे। गृह सचिव आर.के. सिंह और नौ नक्सल प्रभावित राज्यों के पुलिस महानिदेशकों और मुख्य सचिवों की दिन भर चली बैठक में कई अहम फैसले लिए गए। इस बैठक में नक्सल विरोधी कार्रवाई में लगे अर्धसैनिक बलों के महानिदेशक भी मौजूद थे।
इसमें केंद्र ने राज्यों के साथ मिल कर नक्सलियों द्वारा सुरक्षा बलों की ज्यादतियों को लेकर किए जा रहे प्रचार अभियान (प्रोपेगंडा) को काबू करने की योजना पर भी मुहर लगाई है। सुरक्षा बलों के एक उच्च अधिकारी के मुताबिक यह योजना इसलिए अहम है क्योंकि नक्सलियों ने वामपंथी उग्रवाद के शोधकर्ता जॉन म्रिडल के उस थ्योरी पर नया काम शुरू किया है जिसके तहत नक्सलियों को देश के मध्यमवर्ग की सहानुभूति हासिल करनी है। पिछले साल म्रिडल भारत यात्रा पर थे। उन्होंने छत्तीसगढ़ और झारखंड के जंगलों में नक्सलियों को यह पाठ पढ़ाया है कि मध्यमवर्ग को अपनी तरफ खींचे बिना बिना कामयाब नहीं होंगे।
गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि नक्सली इसके लिए सुरक्षा एजेंसियों द्वारा मानवाधिकार हनन की झूठी कहानियों का प्रचार करने की योजना पर तेजी से काम कर रहे हैं। नक्सलियों के खिलाफ योजनाबद्ध लड़ाई के दृष्टिकोण से काफी अहम मानी जाने वाली इस बैठक में जटिल हालात में सुरक्षा बलों की ओर से कोई ज्यादतियां नहीं हों इसके लिए भी ठोस दिशा निर्देशों (एसओपी) पर फैसला लिया गया है। बैठक में नक्सली इलाकों और इससे प्रभावित जंगलों में पक्की सड़क निर्माण की योजनाओं को जल्द से जल्द पूरा करने के उपायों पर भी फैसले लिए गए। गौरतलब है कि पक्की सड़क नहीं होने की वजह से सुरक्षा बलों के काम करने की क्षमता सिर्फ 40 फीसदी ही रह जाती है।












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