लखनऊ को पेरिस बताने वाली माया को यहां से 5 सीटों की उम्मीद

राज्य में बेहतर कानून व्यवस्था व विकास के मुद्दे को लेकर बहुजन समाज पार्टी चुनाव मैदान में है। लखनऊ की तुलना पेरिस से करने वाली बसपा को इस बार प्रदेश की राजधानी लखनऊ से कम से कम पांच सीटें मिलने की उम्मीद है। लखनऊ के देहात क्षेत्र से मौजूदा समय में बसपा के पास तीन सीटें हैं। सर्वजन हिताय सवर्जन सुखाय के नारे के साथ सत्तासीन पार्टी का दावा है कि माहौल उसी के पक्ष में है।
अपनी उपलब्धियों व बेहतर कानून व्यवस्था को आधार बनाकर बसपा का कहना है कि जनता उसे ही चुनेगी। पिछले विधानसभा चुनाव में लखनऊ की तीन सीटों पर कब्जा जमाने के बाद बसपा को उम्मीद है कि इस बार सीटों में बढ़त जरूर होगी। बक्शी का तालाब से चुनाव लड़ रहे नगर विकास मंत्री नकुल दुबे की सीट को बसपा अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर देख रही है।
अपनी पकड़ मजबूत बनाने में जुटी कांग्रेस ने जहां रायबरेली, अमेठी व सुल्तानपुर से चुनावी बिगुल फूंका वहीं इस चरण के लिए कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने लखनऊ आकर विपक्षियों को ललकारा। राहुल ने विपक्षियों के चुनावी वादों को बेमानी बताकर जनता की वाहवाही लूटने की भी कोशिश की।
राजधानी भर में रोड शो कर कांग्रेस ने यहां अपनी पूरी ताकत लगा दी। कांग्रेस के लिए लखनऊ का मतदान इसलिए भी मायने रखता है कि यहां से पार्टी की प्रदेश अध्यक्ष मैदान में है। इनके साथ ही पार्टी की प्रतिष्ठा भी दांव पर है। अब देखना यह है कि उसे इस कवायद का कितना फायदा मिलता है।
पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने का दावा कर रही समाजवादी पार्टी के पास हालांकि इस बार स्टार प्रचारकों का टोटा रहा लेकिन पार्टी युवराज अखिलेश यादव ने ताबड़तोड़ जनसभाएं कर सपा के पक्ष में माहौल बनाने का पुरजोर प्रयास किया। इस चरण के लिए अखिलेश यादव व मुलायम सिंह यादव ने पूरी ताकत लगा दी। अखिलेश यादव ने जिस शालीनता से कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के बयानों का जवाब दिया इससे यह जाहिर है कि सपा युवराज काफी आश्वस्त हैं।
सपा का दावा है कि वह कांग्रेस या किसी अन्य दल के सहयोग के बिना ही सरकार बना सकती है। उधर कांग्रेस की ओर से लगातार यही कहा जा रहा है कि प्रदेश में इस बार कांग्रेस ही वापसी तय है। राममंदिर के सहारे प्रदेश में राज कर चुकी भारतीय जनता पार्टी का भी दावा है कि इस बार लोग उसे ही चुनेंगे। भाजपा के लिए यह चरण इस मायने में भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लखनऊ उसका गढ़ माना जाता है।
पार्टी के दिग्गज नेता कलराज मिश्र जो अपने राजनीतिक जीवन में कभी चुनाव मैदान में नहीं उतरे थे, इस बार वह मैदान में हैं। लखनऊ पूर्वी से कलराज के साथ-साथ पार्टी की प्रतिष्ठा भी दांव पर है। लखनऊ पश्चिम से भाजपा के वरिष्ठ नेता लालजी टंडन के पुत्र गोपालजी टंडन मैदान में हैं। इस पर हालांकि लालजी टंडन का दबदबा रहा है लेकिन उपुचनाव में भाजपा के हाथ से यह सीट चली गयी थी।
इस सीट से लालजी टंडन के बेटे की बजाय अमित पुरी मैदान में थे। उधर मध्य सहित लखनऊ की अन्य सीटों पर भी भाजपा की ही बढ़त रही है। नये परिसीमन के बाद लखनऊ विधानसभा की एक सीट और बढ़ गयी है। देखना यह है कि इस परिसीमन का यह असर पड़ता है। वादों का दावों के साथ जोर-शोर प्रचार करने के बाद बहरहाल सभी दिग्गजों की निगाह इस चरण में लगी है। मतदाताओं का रूख क्या होता है यह तो चुनाव परिणाम ही बतायेंगे लेकिन जनता के सामने वादे व दावे बहुत हैं।












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