राहुल गांधी के लिए बड़ी चुनौती बने मुस्लिम वोट

लखनऊ। उत्‍तर प्रदेश के ज्‍यादातर मुसलमान भाजपा को अपना कट्टर दुश्‍मन मानते हैं। इसलिए इनके वोट या तो कांग्रेस के खाते में गिरते हैं या समाजवादी पार्टी के। लेकिन इस बार समीकरण यहां भी बदल सकते हैं। मुस्लिम धर्मगुरुओं के भाषणों ने कांग्रेस को चिंता में डाल दिया है, यही कारण है कि राहुल गांधी अब मुस्लिम बहुल्‍य क्षेत्रों पर ज्‍यादा ध्‍यान दे रहे हैं। मुस्लिम धर्मगुरुओं की इस चुनौती के खिलाफ जंग उनके रोड शो के दोरान दिखी।

राजधानी लखनऊ में राहुल गांधी के रोड शो के ठीक एक दिन पहले शिया धर्मगुरु कल्‍बे जव्‍बाद ने मुसलमानों से अपील की थी कि वे कांग्रेस को वोट नहीं दें। कल्‍बे जव्‍बाद ने कहा कि कांग्रेस के अलावा मुस्लिम चहे किसी को भी वोट दें उन्‍हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा। बस कांग्रेस को नहीं दें। इससे पहले जामा मस्जिद के उलेमा भी समाजवादी पार्टी का खुला समर्थन कर चुके हैं।

इसे देखते हुए लखनऊ में जब राहुल के रोड शो में लोगों का उत्साह देखाई दिया तब जाकर कांग्रेसियं गया। हालांकि कुछ एक स्थानों पर लोगों ने राहुल का विरोध करने का प्रयास किया लेकिन वह खुलकर सामने नहीं आ सके। उधर मुस्लिम मौलाना कांग्रेस के पक्ष में वोट न देने की अपील जारी कर ही चुके थे ऐसे में राहुल का रोड शो कई मायनों में महत्वपूर्ण रहा।

12 नवंबर से प्रदेश में धुआंधार जनसभाएं कर रहे राहुल गांधी ने राजधानी में रोड शो के जरिए विपक्षियों को खरी-खोटी सुनाई। कहा जाता है कि लखनऊ अटल की धरती है और यहां लोग कमल पर ही मुहर लगाते हैं बावजूद इसके राहुल ने पुराने बातों की परवाह न करते हुए लोगों से सम्पर्क साधा। राहुल गांधी विशेष रूप से बनायी सफेद बस पर सवार हुए, जिसके दोनों ओर विधानसभा में पार्टी का नारा उठो जागो, बदलो लिखा था।

बस के दरवाजे पर खडे़ राहुल ने लोगों की शुभकामनायें लीं उनके साथ प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी भी दरवाजे पर ही खड़ी रहीं। राहुल का रोड शो अमौसी हवाई अड्डे के पास शुरू हुआ और सभी छह विधानसभा क्षेत्र में 34 किलोमीटर की दूरी तय कर अतिविशिष्ट अतिथि गृह के पास समाप्त हुआ। करीब तीन घंटे तक चले रोड शो में गांधी आलमबाग, आशियाना, लालबाग, कैसरगंज, रूमी दरवाजा, पक्का पुल व खदरा आदि जगहों से गुजरे। खास बात यह है कि राहुल का रथ मुस्लिम बहुल्‍य इलाके में सबसे ज्‍यादा देर तक रुका।

इन जगहों पर रुक कर राहुल ने जिस बात पर सबसे ज्‍यादा जोर दिया वो यह कि भाजपा हिन्‍दूवादी राजनीति करती है, बसपा दलितों के नाम पर वोट मांगती है और समाजवादी पार्टी खुद को मुसलमानों की हितैशी बताती है। सिर्फ कांग्रेस एक ऐसी पार्टी है, जो जाति धर्म से परे होकर काम करती है।

2002 और 2007 के चुनावों की बात करें तो जिन मुस्लिम बहुल्‍य इलाकों में कांग्रेस के वोटबैंक पर सपा ने डाका डाला था, उनमें अधिकांश पर 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को बढ़त हासिल हुई थी। अब सवाल यह उठता है कि 2009 में मिली बढ़त को कांग्रेस इस चुनाव में बरकरार रख पाती है या नहीं।

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