भाई के नाम पर की पुलिस में 35 साल नौकरी

सिरसा पुलिस में 14 मार्च 1977 को बाबूराम पुत्र रामसरूप, गांव शामपुरा थाना सढौरा जिला यमुनानगर भर्ती हुआ था। सिरसा पुलिस में भर्ती होने पर उसे बेल्ट नंबर 135 दिया गया था लेकिन कुछ समय बाद बाबूराम की चंडीगढ़ पुलिस में प्रतिनियुक्ति होने पर बेल्ट नंबर 301 मिला था। 23 नवंबर 2011 को संदिग्ध हालात में बाबूराम ने कोई दवा पी थी जिसके बाद उसकी तबीयत बिगड़ गई।
परिजन उसे सढौरा के अस्पताल ले गए जहां एमएलआर में बाबूराम पुत्र रामसरूप नाम दर्ज किया गया था। वहां से उसे सामान्य अस्पताल यमुनानगर रेफर कर दिया। यमुनानगर अस्पताल में बाबूराम के परिजनों ने उसका नाम बाबूराम उर्फ रतन लाल लिखवाया था। यमुनानगर से बाबूराम को चंडीगढ़ रेफर कर दिया मगर रास्ते में उसकी मौत हो गई थी।
पुलिस ने मृतक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी उल्लेख किया कि बाबूराम उर्फ रतन लाल पुत्र रामसरूप की मौत हो गई है, लेकिन जब पुलिस की टीम मृतक के गांव शामपुर गई तो वहां ग्रामीणों से पता चला कि जिस बाबूराम की मौत होने की खबर है, वह तो जिंदा है। मौत बाबूराम के भाई रतन लाल की हुई है और बाबूराम व रतन लाल दोनों सगे भाई है।
इस मामले की जांच सढौरा थाने की पुलिस ने आगे बढ़ाया जो सामने आया कि रतन लाल कम पढ़ा हुआ था जबकि बाबूराम मैट्रिक पास था। रतन लाल बाबूराम से मिलीभगत करके बाबूराम के मैट्रिक के प्रमाण पत्र के आधार पर सिरसा पुलिस में भर्ती हो गया था। वह लगभग 35 साल तक बाबूराम के प्रमाण पत्रों के आधार पर पुलिस में नौकरी करता रहा मगर पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लगी।
इससे तो यही लगता है कि यदि रतन लाल की मौत नहीं होती तो वह बाबूराम के नाम से नौकरी करता हुआ सेवानिवृत्त भी हो जाता। सवाल उठता है कि रतन लाल अपने भाई बाबूराम के नाम से इतने लंबे समय तक पुलिस की नौकरी कैसे करता रहा। अब सढौरा पुलिस की जांच रिपोर्ट यमुनानगर के एसपी कार्यालय ने सिरसा पुलिस अधीक्षक को भेजी है क्योंकि मामला सिरसा जिला पुलिस से जुड़ा हुआ है।












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