जेल से चुनाव लड़ सकते हैं, वोट क्यों नहीं डाल सकते?
मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद, प्रेम प्रकाश सिंह ऊर्फ मुन्ना बजरंगी और ब्रजेश सिंह के नाम आपने सुने होंगे। ये वो माफिया हैं, जिन पर हत्या, अपहरण, गैंगेस्टर ऐक्ट आदि समेत कई धाराएं लगी हुई हैं और जेल में बंद हैं। उत्तर प्रदेश में ऐसे करीब 69 माफिया हैं जो इस बार जेल के अंदर से चुनाव लड़ रहे हैं। इन प्रत्याशियों के दोस्त, रिश्तेदार और पार्टी कार्यकर्ता उनके नाम का खुलकर प्रचार कर रहे हैं। हम सभी जानते हैं कि अगर वो सत्ता में आये, तो कहीं न कहीं उन्हें राहत जरूर मिलेगी और वो जेल से छूट कर सीधे विधान भवन पहुंचेंगे।
एक तरफ ये 69 माफिया हैं, जिन्होंने बड़े-बड़े अपराध किये हैं, और दूसरी तरफ जेल में बंद हजारों कैदी। माफियाओं को जेल से चुनाव लड़ने का अधिकार दिया जा रहा है, वहीं कैदियों से वोट डालने का अधिकार छीना जा रहा है। इसके पीछे तर्क चाहें कोई भी हों लेकिन सवाल लाजमी है- अगर चुनाव आयोग माफियाओं को जेल से चुनाव लड़ने की इजाजत दे सकता है, तो जेल में बंद कैदियों से वोट डालने का अधिकार क्यों दिया जाता। सवाल यह कि अगर जेल में बैठे माफियाओं को अच्छे बुरे की समझ हो सकती है, तो क्या आम कैदी अच्छे बुरे प्रत्याशियों की पहचान नहीं कर सकते।
खास बात यह है कि इन कैदियों के वोट के बारे में न तो आज तक सरकार ने सोचा और न ही चुनाव आयोग ने। यही नहीं राजनीतिक पार्टियों ने भी आज तक ऐसी कोई मांग नहीं उठाई। अगर सरकार, आयोग और पार्टियां यह सोचती हैं कि जेल में बंद व्यक्ति को वोट देने का अधिकार नहीं तो यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 का उल्लंघन होगा। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के अंतर्गत सरकार के सामने हर व्यक्ति बराबर है। अब यदि यह कहा जाये कि कैदी वोट नहीं दे सकते, तो इस अनुच्छेद का उल्लंघन होगा।
इस बारे में हमने अखिल भारतीय अधिकार संगठन के अध्यक्ष व श्री जयनारायण पीजी कॉलेज लखनऊ के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. आलोक चांटिया से बात की तो उन्होंने कहा, "संविधान के मुताबिक तो कैदियों से मताधिकार छीनना गलत है, लेकिन जहां तक मुझे लगता है सुरक्षा कारणों से सरकार इससे बचती है। हालांकि टेक्नोलॉजी के इस दौर में सरकार को ऐसी तकनीक जरूर खोजने की जरूरत है, जो कैदियों को उनका अधिकार दिला सकें।"













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