इस गांव में कोई औरत वोट नहीं डालती

महिलाएं घर में रहती हैं। जिसने डाला वह अपवाद ही है। यह गांव मोहम्मदी तहसील का सेहरुआ है। जिला मुख्यालय से इसकी दूरी महज 20 किलोमीटर है। तमाम कोशिशों के बाद भी यह बंदिश टूटी नहीं। इस बार के चुनाव पर यहां नजर इसलिए भी है कि आधी आबादी वोटिंग मशीन का बटन दबाने का अधिकार पाती है या नहीं। सेहरुआ गांव की तस्वीर दूसरे गांवों जैसी ही है। औरतें खेतों में मर्दों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करती हैं। शिक्षामित्र ही नहीं, गांव में सेहत महकमे की सबसे छोटी एवं अहम कड़ी के रूप में आशा बहु के रूप में भी कार्यरत हैं।
लेकिन मतदान के दिन इन सबके पांव देहरी पार नहीं कर पाते। हाल यह है कि छह दशकों से आजाद भारत में हो रहे चुनावों में कभी छह महिलाओं ने एक साथ वोट नहीं डाले। यहां पहले ही चुनाव के समय बुजुर्गो ने व्यवस्था दी थी कि जब मर्दों एवं औरतों के वोट बराबर होते हैं, तो क्यों घर की बहू-बेटियां क्यों बे-पर्दगी करें। मर्दों की वोट से ही जीत-हार तय कर ली जाए। भला चुनाव में औरतों के वोट का क्या काम! वक्त बदला, लेकिन यह रवायत नहीं बदली।
लोकतन्त्र के इस त्यौहार पर भले पूरा देश झूम रहा हो, लेकिन यहां की आधी आबादी खामोश है। गांव में महिला शिक्षामित्र महताब बेगम, आंगनबाड़ी कार्यकत्री बिटोली देवी, आशाबहू मीना एवं सुषमा मौर्या कार्यरत हैं। पहले यह गांव हैदराबाद विधानसभा क्षेत्र में आता था। यह गांव इस बार कस्ता से जोड़ दिया गया है। 1995 में प्रधान पद महिला के लिए आरक्षित था। तब दोनों प्रत्याशियों महरून निशा एवं शिवकुमारी ने अपना वोट डाला था। 2009 के लोकसभा चुनाव में गांव ने मतदान का बहिष्कार किया। प्रशासन ने प्रयास किए तो 16 वोट पड़े। इसमें गांव के चौकीदार फूलचंद की बीबी गुलकंडा व शूका देवी का भी वोट शामिल था। 2010 में पंचायत सदस्य पद की उम्मीदवार अर्चना और उनकी बहन अन्नू ने वोट डाले थे।
गांव की वोटरलिस्ट में 1184 मतदाता दर्ज हैं। इसमें 769 पुरुष और 415 महिलाए हैं। 211 नए वोट भी बने हैं। बीएलओ मोहम्मद फुरकान कहते हैं, ‘नए वोटर को कार्ड थमाते हुए वोट डालने की अपील भी करता हूं, यह तो वक्त बताएगा कि असर कितना हुआ।’












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