सोशल इंजीनियरिंग की रस्सी थाम छवि चमकाने में लगी बसपा
ऐसे विधायकों को इस बात के संकेत करीब दो महीने पहले ही दे दिये गये थे जब मुख्यमंत्री ने भ्रष्टाचार में संलिप्तता और जनसमस्याओं पर ध्यान नहीं देने के आरोप में अपने अनेक मंत्रियों को बर्खास्त करना शुरू किया था। बसपा ने इस बार राम अचल राजभर, राकेशधर त्रिपाठी, सुभाष चंद्र पाण्डेय, बादशाह सिंह, अवधपाल सिंह यादव, फतेह बहादुर सिंह, सदल प्रसाद, अशोक दोहरे, आनंद सेन यादव, अनंत मिश्र, रतनलाल अहिरवार, अनीस अंसारी, शहजिल इस्लाम, चंद्रदेव राम यादव, राजपाल त्यागी, नारायण सिंह, अवधेश कुमार वर्मा, हरिओम उपाध्याय और अकबर हुसैन जैसे प्रदेश के अनेक पूर्व मंत्रियों के टिकट काट दिये हैं। बसपा पदाधिकारी ने बताया कि पिछली बार के हिट सोशल इंजीनियरिंग फार्मूला को पार्टी एक बार फिर मजबूती से थामकर चल रही है।
उन्होंने बताया कि सर्वजन हिताय के फार्मूला के तहत बसपा ने आगामी विधानसभा चुनाव में जातीय संतुलन बरकरार रखते हुए अनुसूचित जाति के 88, अन्य पिछड़ा वर्ग के 113, मुसलमान वर्ग के 85 सवर्ण जाति 117 लोगों को टिकट दिया है जिनमें से ब्रामणों को 74 तथा क्षत्रियों को दिये गये 33 टिकट शामिल हैं। इसके अलावा दल ने वैश्य, कायस्थ तथा पंजाबियों को भी टिकट दिये हैं। मुख्यमंत्री मायावती ने भी कल प्रत्याशियों की अंतिम सूची जारी करते हुए कहा था कि पिछले चुनाव में उनकी पार्टी के भोले-भाले लोगों को झांसे में रखकर कई लोग दल से टिकट लेने में कामयाब हो गये थे और उन्होंने चुनाव जीतने के बाद गलत कार्यों में लिप्त होकर पार्टी और सरकार की छवि धूमिल की।
पदाधिकारी ने बताया कि पार्टी ने इस बार प्रत्याशियों के चयन में इस बात का काफी हद तक ध्यान रखा है कि वे साफ सुथरी छवि वाले तथा बसपा आंदोलन के प्रति समर्पित हों। साथ ही वे क्षेत्र के विकास पर ध्यान देते हों। बसपा ने वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव में अपनी रणनीति बदलते हुए अनुसूचित जाति एवं जनजाति के 97, अन्य पिछड़ा वर्ग के 126, मुस्लिम समाज के 86, ब्रामण समाज के 37 तथा क्षत्रिय समाज के 36 प्रत्याशियों को टिकट दिये थे। कभी तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार का नारा देने वाली बसपा ने साल 2007 के चुनाव में अपनी रणनीति बदलते हुए ब्राहमणों को खास तरजीह दी और संयोग से उसका सोशल इंजीनियरिंग का यह फार्मूला हिट हो गया, नतीजतन बसपा अप्रत्याशित रूप से पूर्ण बहुमत से सत्ता में आ गयी।
साल 2007 के चुनाव में बसपा ने 86 ब्रामणों, 38 क्षत्रियों, 93 दलितों, अन्य पिछड़ा वर्ग के 110 लोगों तथा 61 मुसलमानों को टिकट दिया था और उसे चुनाव में 206 सीटों के रूप में बहुमत मिला था। सोशल इंजीनियरिंग का यह जांचा-परखा फार्मूला इस बार बसपा के लिये कितना फायदेमंद होगा यह तो समय ही बताएगा लेकिन इतना तय है कि बदले माहौल में बसपा को इससे तमाम उम्मीदें होंगी।













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