जातिवाद के चारों तरफ घूम रहा यूपी चुनाव 2012
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में खोई हुई सत्ता को हासिल करने के लिए जीजान से जुटे राहुल गांधी हों या फिर मुलायम सिंह यादव। मुख्यमंत्री मायावती की बसपा हो या फिर भारतीय जनता पार्टी सभी के समीकरण जातिवाद के आधार पर टिके हुए हैं। एक भी समीकरण गड़बड़ाया नहीं कि वोटबैंक पर सीघा आघात पहुंचेगा। और उसके परिणाम स्वरूप मिल सकती है भारी हार, जो शायद कुछ लोगों के लिए जीवन भर नहीं भूलाने वाली होगी।
जातिगत समीकरणों की बात करें तो इस चुनाव में सवर्ण, दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग के वोट कहीं न कहीं पार्टियों के बीच पेंडुलम की तरह घूम रहे हैं। वोट कहां गिरेगा यह तो फरवरी में पता चलेगा, लेकिन कोई भी पार्टी इस चुनाव में जाति को आधार बनाने में पीछे नहीं है। सबसे पहले नाम आता है राहुल गांधी का। वो पिछले कई सालों से दलितों के घर जाकर रोटी खा रहे हैं और रातें बिता रहे हैं। सवाल यह उठता है कि गरीबों के बीच राहुल को दलित ही क्यों दिखाई देते हैं। वो किसी गरीब ब्राह्मण के घर क्यों नहीं रुकते? जाति और धर्म को अधार पर तैयार रणभूमि में चुनाव के ठीक पहले केंद्र में कांग्रेस सरकार ने ओबीसी में मुसलमानों की कुछ जातियों को आरक्षण दे दिया।
वहीं हमेशा से हिन्दू वोट को आधार बनाने वाली भारतीय जनता पार्टी ने बसपा से निष्कासित बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में शामिल कर यह जताने की कोशिश की कि वो भी दलितों का हित चाहती है। लेकिन एनएचआरएम घोटाले के आरोप झेल रहे कुशवाहा के आगमन ने भाजपा को नीचे धकेल दिया है। पहले जहां भाजपा दूसरी सबसे बड़ी दावेदार मानी जा रही थी, वहीं अब इसे तीसरे व चौथे स्थान पर देखा जा रहा है। हालांकि इस बात से पार्टी के कई वरिष्ठ नेता खासे नाराज भी हैं।
उधर समाजवादी पार्टी अपनी रथयात्रा के हर पड़ाव पर मुसलमानों, यादवों और क्षत्रियों को टटोलने के प्रयास कर रही है। आईपैड से लैस रहने वाले अखिलेश यादव अपने हर भाषण में मायावती सरकार को सामने खड़े लोगों की बर्बादी का कारण बताते हैं और हर बार उन लोगों की जाति को भाषण में जोड़ देते हैं। मुख्यमंत्री मायावती की सोशल इंजीनियरिंग भी इस बार लगभग 2007 के चुनाव जैसी ही नजर आ रही है। उस दौरान भी वो दलितों के साथ सवर्णों व मुसलमानों को तरजीह देती दिख रही थीं और इस बार भी वो उसी पैटर्न पर चल रही हैं।
कुल मिलाकर देखा जाये तो उत्तर प्रदेश की गरीब जनता को सभी पार्टियों ने फंसा दिया है। अब कौन किसे वोट देगा यह तो मतगणना में साफ हो जायेगा, लेकिन जाति के आधार पर चुनाव जीतने वाली पार्टी क्या उत्तर प्रदेश को गुजरात के बराबर बना पायेगी। शायद नहीं, क्योंकि गुजरात जैसा राज्य बनाने के लिए चाहिये नरेंद्र मोदी जैसा नेतृत्व। मोदी अन्य पिछड़ा वर्ग के परिवार से हैं, लेकिन सत्ता को हासिल करने के लिए उन्होंने कभी भी अपनी जाति को आधार नहीं बनाया।
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