आम आदमी की जेब पर फिर पड़ी हाथी की लात

आगे की बात करने से पहले आपको बताते चलें कि चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने प्रदेश में मायावती और हाथी की मूर्तियों को कवर करने का आदेश दिया है। आदेश यह भी दिया गया है कि यह काम 11 जनवरी तक हर हाल में पूरा हो जाना चाहिए। चुनाव आयुक्त के इस आदेश के बाद से माया और हाथियों को ढ़कने का काम युद्ध स्तर पर शुरु हो गया है और सफेद प्लास्टिक से सभी मूर्तियों को ढका जा रहा है। यह आदेश विपक्षी दलों की शिकायत के बाद जारी किया गया है। विपक्षी दलों का मनना था कि सड़कों और चौराहों पर माया और हाथी की मूर्ति होना आचार संहित का उल्लंघन है।
उल्लेखनीय है कि पूरे प्रदेश में माया की लगभग एक हजार और उनके हाथियों की 300 मूर्तियां हैं। माया की एक मूर्ति की लागत 1 करोड़ 70 लाख रुपये हैं वहीं एक हाथी की कीमत 1 लाख रुपये हैं। यह उन हाथियों की कीमत है जो साइज में छोटे हैं, बड़े हाथियों की कीमत लगभग 3 लाख रुपये है। मायावती ने बीते वर्ष ही 684 करोड़ रुपये की लागत से दलितों को समर्पित करते हुए एक पार्क का उदघाटन किया था। माया ने इस पार्क का नाम राष्ट्रीय दलित प्रेरणा स्थल एवं हरित उद्यान रखा। 82 एकड़ में निर्मित इस पार्क में सत्तारुढ़ दल बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के चुनाव चिह्न हाथी की 24 मूर्तियों सहित भीम राव अम्बेडकर, कांशीराम एवं मायावती की मूर्तियां लगी हैं।
अगर सिर्फ लखनऊ में मायावती की मूर्तियों की बात करें तो डेढ़ करोड़ रुपये की लागत वाली 24 फीट की मूर्ति प्रतिबिंब स्थल में, वहीं की गैलरी में 47.25 लाख रुपये की लागत से 18 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमा, परिवर्तन स्थल में ही 20.25 लाख रुपये की लागत से 12 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमा, 9 लाख की लागत वाली 7 फीट उंची प्रतीमा, मान्यवर कांशीराम स्मारक स्थल पर 47 लाख की लागत वाली 18 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमा, डॉ. बी आर अम्बेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल पर पौन करोड़ की लागत वाली तीन प्रतिमायें, कानपुर रोड योजना में 47.25 लाख रुपये की लागत से 15 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमा लगी हुई हैं। राज्य के अलग-अलग इलाकों में मायावती की मूर्तियों की संख्या हजारों में है।
खैर सूबे की मुखिया मायावती मूर्तियों पर खर्च की इस दीवानगी पर समय रहते काबू नहीं पाया जा सका, लेकिन चुनाव आने पर उस दीवानगी पर पर्दा डालने की कवायद सरकारी कोष पर अतिरिक्त भार से कम नहीं है। एक सवाल यह भी उठता है कि प्रदेश का बच्चा-बच्चा जानता है कि हाथी बसपा का चुनाव चिन्ह है, तो उस समय सरकारी मशीनरी कहां थी जब हाथियों की फौज पूरे राज्य में खड़ी की जा रही थी।












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