'समाजवादी' मुलायम की परिवारवादी पार्टी

लखनऊ। अंग्रेजी में एक शब्‍द है सोशलिज्‍़म जिसका मतलब होता है समाजवाद। दशकों पहले डा. राम मनोहर लोहिया ने इसी को आधार बनाते हुए देश को नई राह दिखाई थी और बाद में उन्‍हीं विचारों को आधार बनाते हुए उत्‍तर प्रदेश के पूर्व मुख्‍यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी के नाम से खुद की पार्टी का गठन किया। पार्टी को अपार सफलता मिली, लेकिन इसे समय का फेर ही कहेंगे कि पार्टी के अंदर से ही समाजवाद गायब हो गया। आज की डेट में मुलायम की पार्टी महज परिवारवाद पर अमल कर रही है।

मायावती को सत्‍ता से उखाड़ फेंकने के सपने बुन रही समाजवादी पार्टी की विचारधारा शुक्रवार को तब एक बार फिर डगमगा गई, जब मुलायम सिंह ने अपने बड़े भाई राम गोपाल यादव को राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता घोषित कर दिया। इससे पहले इस पद पर पार्टी के वरिष्‍ठ नेता मोहन सिंह थे। इस नियुक्ति के साथ अगर सपा का स्‍ट्रक्‍चर देखें तो सबसे ऊपर मुलायम जो राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष हैं। उनके बाद उनके बेटे अखिलेश यादव जो प्रदेश अध्‍यक्ष के पद पर हैं, नेता विपक्ष के रूप में कुर्सी संभाल रहे हैं मुलायम के भाई शिवपाल सिंह यादव। यही नहीं सांसद धर्मेंद्र यादव का पहले से ही पार्टी में काफी रसूख है। यही नहीं अखिलेश की पत्‍नी डिम्‍पल यादव भी कार्यकर्ताओं के दिशा-निर्धारण में आगे-आगे चल रही हैं।

कुल मिलाकर देखें तो सपा का नाम आते ही इनमें से किसी का नाम सामने नहीं आती। मुलायम के परिवार के अलावा आजम खां जैसे कुछ नेता और हैं, जिनका पार्टी में कद काफी ऊंचा है। लेकिन पार्टी के अंदर कद चाहे कितना ही ऊंचा क्‍यों न हो, अगर जनता अगर नेता को नहीं पहचानती, तो चुनाव नहीं जीता जा सकता। लिहाजा अगर सपा को सत्‍ता में वापसी करनी है, तो पार्टी के अन्‍य वरिष्‍ठ नेताओं को ऐसे पदों पर बिठाना होगा, जहां लोगों से उनका सीधा संपर्क हो और तभी पार्टी के ऊपर लगा परिवारवाद का धब्‍बा भी हट सकेगा।

यही नहीं पार्टी के बड़े फैसले भी मुलायम और अखिलेश ही करते हैं। महज दो लोगों के हाथ में पावर होना भी पार्टी के लिए अच्‍छे संकेत नहीं। यही आलम चुनाव प्रचार का भी है। प्रचार में अगर सपा की तुलना भाजपा से करें तो सपा के ब्रांड एंबेस्‍डर के रूप में सिर्फ अखिलेश ही दिखाई दिये, वहीं भाजपा में उमा भारती, कलराज मिश्र, राजनाथ सिंह और सूर्यप्रताप शाही के नेतृत्‍व में अलग-अलग टीमों ने प्रदेश भर में यात्राएं निकालीं। हां इस मामले में कांग्रेस का चेहरा लगभग सपा जैसा ही है। यहां भी परिवारवाद के साथ-साथ सिर्फ एक ब्रांड एंबेस्‍डर राहुल गांधी ही हैं। खैर अब देखना है कि अखिलेश अपने दम पर बसपा, भाजपा और कांग्रेस से टक्‍कर ले पाते हैं या नहीं।

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