परिवारवाद के जाल में उलझी राजनीतिक पार्टियां

लखनऊ। चुनावी दंगल में हर पार्टी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है लेकिन हर बार की तरह इस बार के चुनाव में भी पार्टियों ने परिवारवाद को ही वरीयता दी है।

सबसे पहले बात सत्तासीन पार्टी बसपा की, जिसने प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्या के बेटे उत्कर्ष मौर्या को कांग्रेस के गढ़ रायबरेली से टिकट दिया है। तो वहीं स्वामी प्रसाद मौर्या की बेटी संघमित्रा को भी जसराना से बसपा का टिकट दिया गया है।

केवल स्वामी प्रसाद मौर्या ही नहीं मायावती के बेहद करीबी और राज्य सभा सांसद सतीश चंद्र मिश्रा के भतीजे अनंत मिश्रा के बारे में भी कहा जा रहा है कि वो बहुत जल्द बसपा ज्वाइन करने वाले हैं। यही नहीं भतीजे की पत्नी भी बसपा में कदम रखने जा रही है। अंदर की खबर रखने वालों के बारे में कहा जा रहा है कि इन दोनों को भी टिकट देने पर चर्चा हो रही है।

यही नहीं बसपा ने अपने करीबी काजी राना के भाई नूर सलीम को छतरवार से, जगजीत सिंह के भाई महावीर राणा को, रामवीर उपाध्याय के भाई रामेशवर दिबई की पत्‍नी सीमा को फतेहपुर सीकरी से, गंगा चरण राजपूत की बहन रामथली देवी को हमीरपुर से और पप्पू चौधरी की पत्नी हेमलता को बागपत से टिकट दिया गया है।

ऐसा नहीं है कि केवल बसपा ऐसा कर रही है। पहले से ही भाई-भतीजावाद की राजनीति के लिए बदनाम सपा ने भी परिवारवाद को महत्व दिया है। मुलायम सिंह ने अपने सगे भतीजे यानी शिवपाल सिंह के बेटे अंकुर यादव को इस बार विधानसभा का टिकट दिया है। इसके अलावा सपा नेता अमीर आलम के भाई नवारिश आलम, सपाई मिथलेश कुमार की पत्‍नी शकुंतला को शाहजहांपुर से सपा का टिकट दिया गया है। तो वहीं नरेश अग्रवाल के बेटे नितिन अग्रवाल हरदोई से और रेवती रमण सिंह के बेटे उज्‍जवल करछाना सीट से सपा का प्रतिनिधित्व करेंगे।

यही नहीं कांग्रेस भी परिवारवाद की परंपरा पर कायम है। उसने भी अपने करीबियों के परिवार वालों को टिकट बांटे हैं। कानून मंत्री सलमान खुर्शीद की पत्नी लुस खुशीर्द फरुखाबाद सीट से चुनाव लड़ेंगी तो वहीं इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा के बेटे राकेश वर्मा भी इस चुनावी जंग में शामिल हैं।

यही नहीं सुल्तानपुर के सांसद संजय सिंह की पत्‍नी अमिता सिंह को भी अमेठी से टिकट दिये जाने की संभावना है। तो वहीं जनफर अली नकवी के बेटे सैफ अली नकवी और राजा दिग्विजय सिंह के दामाद आर रत्‍नाकर सिंह कोभी चुनावी टिकट दिये जाने की बात हो रही है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि स्वच्छ राजनीति का दावा करने वाली पार्टियां एक बार फिर से परिवारवाद का गेम खेल रही है।

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