गीता-कुरान की कसमें सिर्फ फिल्मों में

लेकिन शपथ की फोर्म तय नहीं की गई है। (यानि कि शपथ गीता, कुरान, बाइबल या अन्य किस धर्म ग्रंथ की होगी, इसका जिक्र नहीं है)। गवाही के दौरान सिर्फ परमेश्वर के नाम पर कसमें खाई जाती हैं। अग्रेंजों के जमाने में जरुर इस तरह की कसमें खा कर गवाही दी जाती थी। अंग्रेजों के जमाने में इसकी काफी अहमियत थी। बाद में धीरे-धीरे इसका प्रचलन खत्म हो गया।
1840 मे सरकार ने कानून बना कर इसका दायरा बढ़ा दिया कि लोग चाहे तो ईश्वर या अल्लाह की कसम खा कर गवाही दे सकते हैं, यही सिलसिला चल पड़ा। शुरू में अंग्रेजों ने सोचा इस देश के लोग कल्चर के प्रति ज्यादा भावुक हैं इसलिए गीता या कुरान की कसम खाकर झूठ नहीं बोल सकते । इस लिहाज से इसे लागू किया गया था। लेकिन जल्द ही अंग्रेजों को लगा कि इसका ज्यादा मतलब नहीं है।
इसलिए महज परमेश्वर की कसम खाकर गवाही देने का सिलसिला शुरू कर दिया गया। एक वकील कहते हैं कि मैंने तो कभी भी गीता या कुरान की कसम खा कर गवाही देते नहीं देखा। हां यह जरूर है कि फिल्मों में गीता की कसम खाकर गवाही देने का सिलसिला जारी है। आखिर फिल्मों में यह बदलाव क्यों नहीं आया। वह कहते हैं कि हो सकता है फिल्मी निर्देशकों का ध्यान इस ओर नहीं गया है। मुझे लगता है खबरें छपने के बाद हो सकता है बदलाव दिखे। और आनेवाली फिल्मों में गवाह परमेश्वर की कसम खाते हुए नजर आए।
अब उम्मीद करनी चाहिए आऩे वाली फिल्मों में गवाह गीता या कुरान की कसम खा कर गवाही देते नजर नहीं आएंगे। बल्कि वैसे ही नजर आएंगे जैसा कि अदालतों में होता था। और 170 साल पहले खत्म हो चुका सिलसिला अब फिल्मों में नहीं दिखेगा।












Click it and Unblock the Notifications