यूपी चुनाव 2012 : भीमनगर में फंसा मायावी हाथी

इसका मकसद विधानसभा चुनाव में राजनीतिक लाभ लेना ही माना गया था। भीम नगर जिले के मुख्यालय को लेकर विवाद घोषणा के साथ ही शुरू हो गया था।
इसे लेकर सम्भल व चंदौसी के लोग आमने-सामने भी आ गए। मुख्यमंत्री मायावती तक भी इसकी भनक पहुंच गई और जिले के शासनादेश में ही मुख्यालय सम्भल में बनाने के बजाए तीनों तहसील गुन्नौर, सम्भल व चंदौसी के बीच में बनाने का उल्लेख किया गया। इसके बाद सम्भल में विरोध तेज हो गया। धरना-प्रदर्शन, बाजार बंद भी किए गए। बसपा सांसद शफीकुर्रहमान बर्क के पोते जियाउर्रहमान का भी सम्भल विधानसभा सीट से टिकट कटने के पीछे इसी विरोध को कारण माना गया था।
सियासी मानचित्र पर भी भीम नगर जिला का समीकरण बसपा के पक्ष में नहीं था।गुन्नौर की विधानसभा सीट सपा की परंपरागत सीट है, सम्भल सीट पर भी सपा जीतती आ रही है। चंदौसी सीट पर बसपा वर्ष 2007 में पहली बार जीती थी। असमोली विधानसभा सीट पर इस बार पहली बार चुनाव हो रहा है। मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में जिला बनाने के बाद भी बसपा को लाभ नहीं मिल पा रहा है। सम्भल में जिला मुख्यालय न बनाए जाने के कारण वहां के लोग खुश नहीं बताए जा रहे हैं। यादव बाहुल्य गुन्नौर सीट पर बसपा पहले से ही मात खाती रही है, इस बार जिले का प्रभाव विधानसभा क्षेत्र में दिखाई नहीं दे रहा है।
चंदौसी के लोगों की मुख्यालय बनाए जाने की मांग पूरी नहीं हो सकी है, सिर्फ बहजोई में अस्थाई मुख्यालय बनाए जाने से कुछ लोग जरूर बताए जा रहे
हैं। लिहाजा बसपा चाहकर भी जिले को चुनाव में मुद्दा नहीं बना पा रही है, पार्टी के रणनीतिकारों को विरोध अधिक लाभ कम मिलना प्रतीत हो रहा है।
इसके अलावा सपा, कांग्रेस व भाजपा जिले को मुद्दा बनाने की फिराक में है। सम्भल में यह पार्टियां वहां के लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने की बात कहने की रणनीति बता रहे हैं तो चंदौसी में मुख्यालय स्थाई न बनाए जाने की रणनीति बनाई जा रही है। कुल मिलाकर भीम नगर जिला बनाने के बाद भी बसपा इसका सियासी लाभ नहीं ले पा रही है, विरोधी पार्टियां जरूर बसपा के विरोध में इसे अस्त्र बनाने की रणनीति तैयार कर रहीं हैं। ऊंट किस करवट बैठता है यह भविष्य तय करेगा।












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