काकोरी काण्ड में फांसी पर झूले शहीद रोशन सिंह को मिली गुमनामी

शाहजहांपुर के नेवादा गांव में 22 जनवरी 1894 में जन्में रोशन सिंह ने देश की आजादी के लिए अपने प्राण दे दिए। बरेली और शाहजहांपुर में असहयोग आन्दोलन चला रहे रोशन सिंह को बरेली में हुये गोलीकांड में दो साल के कैद की सजा दी गयी। उनके पिता का नाम जगदीश सिंह उर्फ जंगी सिंह था। रोशन सिंह ने मिडिल तक शिक्षा लेने के बाद एक प्राइमरी स्कूल में शिक्षक की नौकरी कर ली। नौकरी के दौरान उन्होंने भारतवासियों की दुर्दशा देखी जिसके बाद मन देश की आजादी में योगदान देने को हुआ।
इसी के साथ उन्होंने शिरगंज बिचपुरी मैनपुरी व अन्य डकैतियों में साथ दिया। इसी बीच देश में असहयोग आंदोलन शुरू हो गया तो वह उसमें शामिल हो गए। इसी दौरान बरेली में गोली चली और उन्हें दो वर्ष की कैद हो गयी। इसके बाद तो जैसे उनके भीतर आजादी की मशाल जल उठी और वह काकोरी ट्रेन डकैती में शामिल हो गए। उनके बारे में कहा जाता है कि वह एक अचूक निशानेबाज थे। जब वह पकड़े गए और मुकदमा चला तो न्यायाधीश हेमिल्टन ने पहले उन्हें पांच साल के कैद की सजा दी जिसे बाद में बदल कर फांसी कर दिया।
रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनकर जैसे सबको सांस सूंघ गया। देश वासियों को अंग्रेजों से न्याय की उम्मीद तो न के बराबर थी लेकिन ऐसे अन्याय की कल्पना किसी ने नहीं की थी। उन्हें अंग्रेजी नहीं आती थी अत: फैसला सुनने के बाद उन्होंने बगल में खडे व्यक्ति से से पूछा कि फाइव इयर्स-फाइव इयर्स इससे आगे भी तो कुछ था वह क्या था। उस व्यक्ति ने उनकी कमर में हाथ डालते हुए कहा पंडित राम प्रसाद बिस्मिल और राजेन्द्र नाथ लाहिडी के साथ साथ आपको भी फांसी मिली है जबकि इनके वकील व साथियों का ख्याल था कि रोशन सिंह को फांसी की सजा नहीं मिलेगी।
फांसी की खबर सुनकर रोशन सिंह एकदम उछल पड़े। सभी आश्चर्य से उन्हें देख रहे थे, लेकिन उस कर्मयोगी के तेजस्वी चेहरे पर स्वाभाविक शांति थी। बिस्मिल, अशफाक और राजेन्द्र लाहिड़ी की ओर देखकर वे बोले तुम लोग अकेले जाना चाहते थे न लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने जज हेमिल्टन से हंसकर कहा आपने लडकों के सामने मेरी बुजुर्गी की लाज रख ली। फांसी के एक दिन पहले मिलने आए लोगों से उन्होंने कहा कि तुम लोग मेरी फिकर मत करो। भगवान को अपने सभी बेटों का ध्यान रहता है। ठाकुर रोशन ङ्क्षसह को 19 दिसम्बर 1927 को मलाका जेल वर्तमान में इलाहाबाद का स्वरपरानी नेहर अस्पताल परिसर में फांसी दी गई थी।












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