अन्ना हजारे ने बदला सियासत का चेहरा

दैट्स हिंदी के संवाददाता ने कई लोगों से बातचीत की। पर सबका कहना था कि इसबार आर पार की लड़ाई लड़नी है। देश में लोकपाल के लिए हम कुछ भी करने के लिए तैयार हैं। यदि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लंबी चली तो वह सबकुछ छोड़कर वह लड़ाई में कूद पड़ेंगे। दिन चढ़ता जा रहा था वैसे ही वैसे जंतर मंतर पर भीड़ बढती जा रही था। दिन के बारह बजे अब जंतर मंतर पर खड़े होने के लिए भी जगह नहीं बची थी। अनुमान की करीब 20 हजार की संख्या में लोग पहुंच चुके थे। फिर शुरू हुआ सियासी खेल। जिसके लिए बडे ही कौतुहल के साथ इंतजार कर रहे थे। दिन के 12.45 बजे घोषणा हुई कि सियासी दलों के लोग अब हमारे बीच पहुंचने वाले हैं वैसे ही लोगों में सर्गर्मियां बढ़ गई। फिर शुरू हुआ भ्रष्टाचार रूपी काठ की हांडी पर चर्चा। यह पहला मौका था जब इस प्रकार के मंच पर देश की साठ फीसदी सियासत एक साथ चर्चा के लिए मंच पर आई। यह भारतीय लोकतंत्र का बदलता हुआ चेहरा था जो भरपूर सियासत को इतिहास में समेटे दिल्ली की सौवीं सालगिरह के जश्न में नया रंग भर रहा था। लोकपाल को लेकर अन्ना का आंदोलन देश की अधिकांश सियासत को अपने साथ समेट लाया।
मीडिया कर्मी भी कहां मानने वाले थे पुलिसकर्मियों से कुछ बहस के बाद आखिर अंदर जाने में कामयाब हो ही गए। अंदर का माजरा पूरी तरह से अन्ना मय था। हजारों की संख्या में लोग तिरंगा लिए अन्ना के स्वागत में पलके बिछाए खड़े थे। कोई कटक से आया था तो कोई कर्नाटक से। कोई तमिलनाडु से आया था तो कोई कश्मीर से। कोई सुदूर आदिवासी इलाका से आया तो कोई मार्डन मुंबई से। पर हर किसी की आंखें बस अन्ना को खोज रही थीं। जैसे ही मंच पर अन्ना पहुंचे वंदेमातरम के नारों से जंतर मंतर गूंज उठा। चारों तरफ लोगों के हाथों में तिरंगा लहरा रहा था। सबके चेहरे पर चमक थी तो आत्म विश्वास भी कि इस बार सशक्त जनलोकपाल बिल इस बार लेकर रहेंगे।
जंतर मंतर पर अन्ना का यह दूसरा अनशन था। पहला अनशन इसी साल अप्रैल में हुआ था। पर इस बार आंदोलन में अन्ना के सिपाहियों में सबसे ज्यादा मार्डन लड़के और लड़कियां थीं जो अपने चेहरे पर मुस्कान लिए सबका दिल जीतने का प्रयास कर रहीं थीं। हालांकि उनके चेहरे पर मुस्कान के साथ ही किसी अनहोनी की आशंका भी थी इसीलिए बीच बीच में वह कई लोगों से कुछ पूछताछ भी कर रही थीं। खास तौर पर वह जानना चाहतीं थी कि वह क्यों आए हैं। जंतर मंतर पर अन्ना का अनशन शुरू हो चुका था। लोग अब मंच पर आकर सशक्त लोकपाल के बारे में लोगों को बताना शुरू कर दिया था। पर इसी के साथ लोगों का जंतरमंतर पर आना जारी थी।
किसी गैर राजनीतिक मंच पर इतने सारे दलों का एक साथ बैठना ही अनोखा था और इसके बाद जब सबने एक साथ सरकारी लोकपाल को खारिज किया तो पूरी मुहिम को एक नया राजनीतिक अर्थ मिल गया। इसमें कोई शक नहीं कि लोकतंत्र का यह नया चेहरा कुछ जिद्दी जरूर था। इसलिए लोकपाल पर जनबहस लंबी नहीं चली मगर लोकपाल के प्रावधानों पर लोगों के स्पष्ट स्वीकार एवं इंकार से,सियासत को भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता के मूड की बानगी जरूर मिल गई। यह धारणा चौथी बार टूटी कि लोकपाल को लेकर जनसमर्थन घट रहा है। क्योंकि जंतर मंतर पर तिल रखने की जगह नहीं थी।












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