सिर्फ माया नहीं, अन्‍य पार्टियां भी फेंक रहीं जातिवादी कार्ड

Uttar Pradesh Chief Minister Mayawati
दिल्ली (राजेश केशव)। भारत को गणतंत्र हुए लगभग 62 वर्ष बीत चुके हैं। सब कुछ बदल चुका है। पर एक चीज अभी तक नहीं बदली है वह है जाति आधारित राजनीति। इसी की परिणति है कि रविवार को यूपी की मुख्यमंत्री मायावती ने एक बार फिर सियासत की चाबी जाति आधारित राजनीति को सौंप दी। हालांकि उनकी यह रणनीति है, क्योंकि इसी सियासी रणनीति से उन्होंने इस बार सत्ता की कुंजी पकड़ी है। वैसे मायावती कोई इकलौती सियासतदार नहीं है जो जाति को आधार बनाकर सत्ता की कुर्सी पर काबिज होना चाहती हैं, बल्कि यूपी के सारे दल इसी की खेल में परांगत हैं।

कुछ पार्टियां तो जाति के आधार पर ही गठित ही हुई हैं और कुछ बड़े नेता भी अपनी जाति का धौंस दिखलाकर ही अन्य पार्टियों से गठजोड़ करते हैं। इसलिए कम से कम यूपी की राजनीति में तो जाति का ही बोलबाला है। इसी कवायद के तहत यूपी की मुख्यमंत्री मायावती ने रविवार को आवाज दी कि ब्राह्मण शंख बजाएगा तो ही हाथी आगे बढ़ता जाएगा।

बसपा ही नहीं सूबे में अन्य पार्टियां भी चाहे वह छोटी हों या बड़ी सभी जाति पर आधारित राजनीति का हथकंडा अपनाए हुए हैं। यूपी में जातिगत पार्टियों की बात करें तो बसपा (दलित वोटों के सहारे सत्‍ता में), अपना दल (कुर्मियों की पार्टी), कौमी एकता दल (मुस्लिमों की पार्टी), पीस पार्टी (मुस्लिमों पर नजर), चौधरी अजित सिंह की रालोद (पश्चिम के जाटों पर नजर), कल्याण सिंह की जन क्रांति पार्टी (लोधी जाति पर निगाह), राम विलास पासवान की लोजपा (पासवान-हरिजनों पर नजर), लालू प्रसाद यादव की राजद (यादवों पर नजर), सपा (यादवों औऱ मुस्लिमों पर नजर), इस प्रकार की कई पार्टियां यूपी में हैं जो जाति पर आधारित ही है। इसलिए अभी भी यूपी और उत्तर भारत के राज्यों में उम्मीदवार की काबिलियत से ज्यादा उसकी जाति आंकी जाती है।

बड़ी पार्टियां भी जब भी टिकट का बंटवारा करती हैं तो वे भी सबसे पहले यह देखती है कि इलाके में किस जाति के लोग हैं। किस जाति का उम्मीदवार सीट निकाल सकता है। इसलिए उसी उम्मीदवार को टिकट दिया जाता है जो जाति के ढांचे में फिट बैठता है। हालांकि मायावती और मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल इस जाति आधारित राजनीति में सबसे आगे हैं। क्योंकि इन्होंने न केवल जाति के आधार पर कमेटियां गठित कर रखी हैं बल्कि ये जातिगत राजनीति को वर्तमान में सबसे ज्यादा बढावा भी दे रही है।

हालांकि भाजपा और कांग्रेस भी इस खेल में पीछे नहीं है। ये दोनों पार्टियां भी इस खेल को खूब भूना रही है। मसलन कांग्रेस की नजर अपने पारंपरिक वोट मुस्लिमों और एससी एसटी पर ज्यादा है वहीं भाजपा की नजर व्यापारी वर्ग और बाह्मणों पर ज्यादा है। पर हरेक पार्टियों ने जाति को आधार बनाकर उस वर्ग के एक नेता को अपनी पार्टी में बडा पद दिया हुआ है जिससे उस जाति पर प्रभाव डाला जा सके। मसलन बीजेपी को मुस्लिमों का वोट नहीं मिलता है पर इस जाति के दो नेताओं (शाहनवाज-मुख्तार अब्बास नकवी) को पार्टी में उच्च स्थान प्राप्त है।

वहीं कांग्रेस निचले तबके से आनी वाली मीरा कुमार को पार्टी के शीर्ष पद पर तो रखे ही हुए हैं साथ ही उन्हें लोकसभा अध्यक्ष जैसा पद भी देने से नहीं चूकी। राहुल गांधी भी इसी वर्ग को पकड़ने के लिए उनके घरों में जाकर, उनके साथ भोजन करने और उनके बीच रहने का प्रयास करते हैं जिससे इस वर्ग में यह संदेशा जाय कि कांग्रेस इस वर्ग की सबसे बड़ी हिमायती पार्टी है पर बसपा इस वर्ग को अपने से किसी अन्य के पास फटकने नहीं देना चाहती इसलिए अपनी पारंपरिक वोट को हासिल करने के लिए न केवल इनके हित में काम कर रही है बल्कि इन्हीं के बल पर सत्ता पर काबिज भी है।

पर समय बदल रहा है, अवाम जागरुक हो रही है पर पार्टियां अभी भी जाति के आधार पर सियासत करने में लगी हुई हैं क्योंकि सियासत की किताब में और सियासतदार के पाकेट में सिर्फ जाति का ही ट्रंप कार्ड है जिससे वे अपनी नैया पार लगाना चाहते हैं और वे कम ज्यादा पार करते भी हैं पर अवाम अब जाति आधारित राजनीति नहीं बल्कि विकास चाहती है, रोजगार चाहती है, अमन चाहती है। जिससे वह आम से खास हो सके।

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