गजब चिदंबरम उमर से सहमत भी, एएफएसपीए का मामला टालने के पक्ष में

सूबे में सियासी तौर पर संवेदनशील विशेष कानून के मुद्दे पर चिदंबरम ने अपनी इस प्रतिक्रिया के जरिए केंद्र के फिलहाल बीच का रास्ता पकड़ कर चलने का ही संदेश दिया है। उमर की मांग पर ऐतराज जता रही सेना और रक्षा मंत्रालय के दबाव में भी केंद्र इस पर अभी जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लेना चाह रहा है। केंद्र की इस मुद्दे पर रणनीति फिलहाल यही है कि एएफसपीए पर धीमे चलकर ऐसी स्थिति बन जाने दें कि अगर सूबे के कुछ इलाकों में इसे हटाया भी गया तो उमर की पार्टी नेशनल कांफ्रेंस को ही इसका सियासी फायदा न मिल जाए।
यही वजह है कि इस पर एक तरफ उमर की मांग से सहमति जताकर चिदंबरम ने राज्य की अवाम को केंद्र के भी विशेष कानून में कटौती के पक्ष में होने का संदेश दिया है तो वहीं कांग्रेस की भी रायशुमारी की मांग को भी जायज ठहराकर अपनी पार्टी को भी इस पर सियासत में प्रासंगिक बनाए रखने की कोशिश की है। जम्मू कश्मीर से विशेष कानून हटाने की उमर की मांग पर इससे पहले कांग्रेस ने अपने कड़े तेवर जाहिर किए थे। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सैफुद्दीन सोज ने कहा था कि उमर की यह मांग कांग्रेस से बिना सलाह मशविरा के उठाई गई है। सोज के इस बयान को पार्टी हाईकमान ने पूरा समर्थन किया था।
कांग्रेस के रुख के चलते माना जा रहा था कि सरकार उमर की मांग को सिरे से खारिज कर देगी। लेकिन चिदंबरम के ताजा रुख से साफ हो गया है कि भले ही कांग्रेस ने कड़ा रुख अपनाया हो लेकिन सरकार कूटनीतिक ढंग से इस मसले से निपटेगी। चिदंबरम ने सोमवार को कहा कि अगर मुख्यमंत्री विशेषाधिकार कानून की समीक्षा की प्रक्रिया को तेज करना चाहते हैं, तो इसमें हैरत की कोई बात नहीं है और न ही कुछ गलत है। लेकिन राय मशविरा की कांग्रेस की मांग भी ठीक है और कैबिनेट में भी और मशविरा हो सकता है। वहीं अलग तेलंगाना राज्य की मांग पर चिदंबरम ने कहा कि ईद के बाद निर्णय की दिशा में सरकार कुछ कदम बढ़ाएगी।
गृह मंत्री पी चिदंबरम ने कहा है कि उनका मंत्रालय जम्मू-कश्मीर पर वार्ताकारों की रिपोर्ट की समीक्षा कर रहा है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से चर्चा के बाद ही इस रिपोर्ट में की गई सिफारिशों पर कोई अंतिम फैसला किया जाएगा। मालूम हो कि गृह मंत्रालय को यह रिपोर्ट 12 अक्तूबर को सौंप दी गई थी। इसमें एएफएसपीए समेत कई मुद्दों पर वार्ताकारों ने अपनी सिफारिशें दी हैं। यह भी माना जा रहा है कि रिपोर्ट पर चर्चा के लिए सर्वदलीय बैठक भी बुलाई जा सकती है। लेकिन सरकार के रुख से साफ है कि वह कोई भी फैसला नहीं करना चाहती। वह चाहती है जैसा कश्मीर चल रहा है वैसा चलता रहे।












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