राजनीति की नब्‍ज को समझती थीं इंदिरा गांधी

Indira Gandhi
नई दिल्‍ली। वर्ष 1984 में आज ही के दिन पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा प्रियदर्शिनी गांधी के बॉडीगार्ड ने उन्‍हें गोलियों से छलनी कर दिया था। सच पूछिए तो यह दिन देश के इतिहास का काला दिन था, क्‍योंकि इस दिन देश ने राजनीति की हर करवट को पहचानने वाली एक नेत्री को खो दिया था।

इंदिरा गांधी को राजनीति विरासत में मिली थी और यही कारण था कि वो राजनीति के हर उतार-चढ़ाव को बखूबी समझती थीं। इंदिरा गांधी को बेहद करीब से जानने वाले कांग्रेस नेता सलीम शेरवानी से बात की तो उन्‍होंने सबसे पहले शब्‍द कहे- इंदिरा जी एक अजीम शख्यियत थीं। उनके भीतर गजब की राजनीतिक दूरदर्शिता थी। पिता जवाहर लाल नेहरू के जरिये वो महात्‍मा गांधी के सानिध्‍य में आयीं। पिता से राजनीति की एबीसीडी सीखी और मात्र ग्यारह साल की उम्र में उन्होंने ब्रिटिश शासन का विरोध करने के लिए बच्चों की वानर सेना बनाई।

1938 में वह औपचारिक तौर पर इंडियन नेशनल कांग्रेस में शामिल हुईं और 1947 से 1964 तक अपने प्रधानमंत्री पिता नेहरू के साथ उन्होंने काम करना शुरू कर दिया। ऐसा भी कहा जाता था कि वह उस वक्त प्रधानमंत्री नेहरू की निजी सचिव की तरह काम करती थीं, हालांकि इसका कोई आधिकारिक ब्यौरा नहीं मिलता।

एक समय गूंगी गुडि़या कही जाने वाली इंदिरा गांधी तत्कालीन राजघरानों के प्रिवी पर्स समाप्त कराने को लेकर उठे तमाम विवाद के बावजूद तत्संबंधी प्रस्ताव को पारित कराने में सफलता हासिल करने, बैंकों का राष्टीयकरण करने जैसा साहसिक फैसला लेने और पृथक बांग्लादेश के गठन और उसके साथ मैत्री और सहयोग संधि करने में सफल होने के बाद बहुत तेजी से भारतीय राजनीति के आकाश पर छा गईं।

पिता के निधन के बाद कांग्रेस पार्टी में इंदिरा गांधी का ग्राफ अचानक काफी उपर पहुंचा और लोग उनमें पार्टी एवं देश का नेता देखने लगे। वह सबसे पहले लाल बहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनीं। शास्त्री जी के निधन के बाद 1966 में वह देश के सबसे शक्तिशाली पद (प्रधानमंत्री) पर आसीन हुईं।

वर्ष 1975 में आपातकाल लागू करने का फैसला करने से पहले भारतीय राजनीति एक धु्रवीय सी हो गई थी जिसमें चारों तरफ इंदिरा ही इंदिरा नजर आती थीं। इंदिरा की ऐतिहासिक कामयाबियों के चलते उस समय देश में इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा का नारा जोर शोर से गूंजने लगा। जामिया मिलिया इस्लामिया में राजनीतिक शास्त्रा के प्रोफेसर फुरकान अहमद कहते हैं, यह सच है कि इंदिरा के वक्त राजनीति एक धु्रवीय हो गई थी। उनकी शख्सियत इतनी बड़ी हो गई थी कि उनके सामने कोई दूसरा नजर नहीं आता था। अपने व्यक्तित्व को व्यापक बनाने के लिए उन्होंने खुद भी प्रयास किया। उन्होंने कहा, इंदिरा के बारे में सबसे सकारात्मक बात यह है कि वह राजनीति की नब्ज को समझती थीं और अपने साथियों से उनका बेहतरीन तालमेल था।

उनके लिए 1980 का दशक खालिस्तानी आतंकवाद के रूप में बड़ी चुनौती लेकर आया। ऑपरेशन ब्लू स्टार को लेकर उन्हें कई तरह की राजनीतिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। राजनीति की नब्ज को समझने वाली इंदिरा मौत की आहट को तनिक भी भांप नहीं सकीं और 31 अक्तूबर, 1984 को उनकी सुरक्षा में तैनात दो सुरक्षाकर्मियों सतवंत सिंह और बेअंत सिंह ने उन्हें गोली मार दी।

दिल्ली के एम्स ले जाते समय उनका निधन हो गया। इंदिरा की राजनीतिक छवि को आपातकाल की वजह से गहरा धक्का लगा। इसी का नतीजा रहा कि 1977 में देश की जनता ने उन्हें नकार दिया, हालांकि कुछ वर्षों बाद ही फिर से सत्ता में उनकी वापसी हुई।

इंदिरा की राजनीतिक विरासत को पहले उनके बड़े पुत्रा राजीव गांधी ने आगे बढ़ाया और अब सोनिया गांधी और राहुल गांधी उससे जुड़े हैं। आज देश और विदेश में इंदिरा के नाम से कई इमारतें, सड़कें, पुल, परियोजनाओं और पुरस्कारों के नाम जुड़े हैं। शेरवानी कहते हैं, मेरा मानना है कि गरीबी मुक्त भारत इंदिरा का एक सपना था। आज भी वह सपना साकार नहीं हो पाया है। सभी लोगों को भारत से गरीबी को मिटाने के लिए मिलकर काम करना चाहिए, ताकि उनके सपने को हकीकत में तब्दील किया जा सके।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+