स्टीव जॉब्स भारत आकर आध्यात्म से तकनीक तक पहुंचे

जाब्स अपने कालेज के दोस्त डेनियल को टके के साथ उत्तरांचल के कैंची आश्रम में नीम करोली बाबा से मिलने गए। जब वह भारत से लौटे तो बिल्कुल बदल चुके थे। एक आदर्श हिंदू की तरह वह नजर आ रहे थे। उन्होंने मुंडन करा लिया था, पारंपरिक भारतीय लिबास धोती धारण कर चुके थे। दुनिया के प्रति और अपने प्रति उनकी धारणा बदल चुकी थी। उनमें एक असीम शक्ति का संचार हो चुका था।
कैलीफोर्निया लौटने पर वह बौद्ध हो गए। भारतीय दर्शन ( हिंदू और बौद्ध) का प्रभाव उन पर इस कदर हो चुका था कि वह संतों की तरह अक्सर खाली पैर चल पड़ते थे। यही नहीं उन्होंने जिंदगी भर शाकाहारी भी रहे। बौद्ध भिक्षु थ्रुमैन कहते हैं कि स्टीव को आंतरिक ताकत भारतीय दर्शन से मिलती थी। जाब्स ने हाल ही में विश्वविद्यालय के छात्रों को संबोधित करते हुए कहा था कि एक बात याद रखना, दूसरों के विचारों के शोर में कभी भी भ्रमित मत होना। अपने अंदर से जो आवाज उठ रही हो उसे कभी भी दुनिया के शोर में दबने मत देना।
संघर्ष के दिनों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि एक ऐसा भी वक्त था जब मैं जमीन पर सोने को मजबूर था। हर रविवार को हरे क़ृष्ण मंदिर में लंगर लगता था। वह खाने के लिए मैं सात किलोमीटर पैदल चल कर जाता था। इसलिए असफलता और खराब हालत से परेशान होने की जरूरत नहीं है। स्टीव ने एक बार स्वीकार किया था कि उन्होंने एससीडी ड्रग का इस्तेमाल किया था।
वह जानना चाहते थे कि आखिर यह क्या बला है। पेप्सिको के पूर्व प्रेसीडेंट जान स्कूली कहते हैं कि जब मैं एक बार उनके घर पर गया तो देख कर हैरत में पड़ गया कि कमरे में एक भी फर्नीचर नहीं था। सिर्फ एक तस्वीर लगी थी। वह तस्वीर थी आइंस्टीन की। स्टीव आइंस्टीन को अपना आदर्श मानते थे। थ्रुमैन कहते हैं बौद्ध धर्म मानता है कि आप ध्यान के जरिए सत्य जान सकते हैं। साथ ही आप अपनी क्षमताओं को असीम बढ़ा सकते हैं। स्टीव जाब्स ने ऐसा ही किया।












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