नवरात्रि - मां स्कंदमाता देगी आर्शीवाद

Maa Skandmata
लखनऊ। माता का पांचवा स्वरूप स्कंदमाता। नवरात्रके पांचवे दिन माता के स्कंद स्वरूप की आराधना की जाती है। मां के इस रूप का नाम स्कंदमाता इस कारण पड़ा क्योंकि वह भगवान कार्तिकेय की मां है। इस नवरात्र चौथे दिन ही मां स्कंदमाता की पूजा की जाएगी। माता का यह रूप बताता है कि हमें अपने जीवन को ज्ञान व आत्मविश्वास रूपी प्रकाश से अलौकित करते जाना चाहिए।

सिंह पर सवार मां का शुभ्रवर्ण इस बात को द्योतक है कि व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक व आत्मिक शांति के लिए सदैव प्रयासरत रहना चाहिए। जिस प्रकार शुभ्र वर्ण प्रकाश की समस्त किरणों को परिवर्तित कर देता है उसी प्रकार मां के इस रूप की स्तुति भर से ही दुष्प्रवृत्तियां, दुर्गुण व आंतरिक दुर्बलताएं जीवन में नहीं आ पाती हैं।

स्कंदमाता भगवान कार्तिकेय की माता हैं जिस कारण उन्हें स्कंदमाता कहा जाता है। इन्हें पद्मासन देवी भी कहा जाता है। दोनों हाथों में कमलदल तथा एक हाथ से अपनी गोद में ब्रहास्वरूप सनतकुमार को थामे हुए हैं। स्कंदमाता की गोद में उन्हीं का सूक्ष्मरूप छह सिर वाली देवी का है जिस कारण इनकी पूजा में मिटटी की छह मूर्तियां सजायी जाती हैं।

स्कंदमाता की आराधना करते हुए भक्तों मन में यह विचार करना चाहिए कि वह मां के आर्शीवचनों का पालन करेंगे तथा बुरे कर्मो से दूर रहकर सदकर्मों पर ध्यान लगाएंगे। ऐसा करने वाले माता के समस्त भक्तों की मनोकामना अवश्यक पूरी होती है। मां का यह दिव्य स्वरूप हमेशा भक्तों को बुरी आदतों से बचाता है।

मां का यह रूपरूप संदेश देता है कि व्यक्ति अपनी शक्तियों व क्षमताओं का सदुपयोग करते हुए इस जीवन पथ में आने वाली समस्यों विषमताओं व कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करता हुए सही मार्ग पर चलता रहे। मां दुर्गा का यह पांचवा स्वरूप अपने भक्तों को तमाम बुरी प्रवृत्तियों से लडऩे की शक्ति प्रदान करता है। नवरात्र के पांचवे दिन इनकी आराधना की जाती है।

माता के मन्दिरों में आज के दिन विशेष पूजा अर्चना की पूजा के साथ इनके पुत्र स्कंद की भी आराधना होती है। माता का यह शुभ्रवर्ण पूरे ब्रह्मiमाण्ड को अपने प्रकाश से लौकिक कर रहा है। मां का यह रूप विश्व में फैले अज्ञानरूपी को अंधकार को दूर करता है जो भी भक्त आज के दिन स्कंदमाता की आराधना सच्चे मन से करता है उसके भीतर की समस्त दुप्रवृत्तियां स्वतं ही समाप्त हो जाती है।

ध्यान मंत्र
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रिकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी।।

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